Strait Of Hormuz: जब भी दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों पर, तो कुछ ऐसे पुराने और हैरान करने वाले विचार दोबारा सामने आ जाते हैं जो सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की तरह लगते हैं। ईरान के होर्मुज पर नाकेबंदी के बाद एक ऐसा ही प्रस्ताव आया है।
प्रस्ताव ये है कि, परमाणु विस्फोटों के जरिए होर्मुज की जगह एक नया वैकल्पिक रास्ता तैयार करना। भले ही यह विचार आज नामुमकिन लगे, लेकिन एक समय में वैज्ञानिकों ने इस पर गंभीरता से अध्ययन किया था। आइए जानते हैं क्या था यह प्रोजेक्ट और आज इसकी चर्चा क्यों हो रही है।
शीत युद्ध के दौरान जन्मा था एक 'क्रांतिकारी' विचार
इस विचार की शुरुआत 1950 के दशक के अंत में अमेरिका के 'प्रोजेक्ट प्लोशेयर' से हुई थी। यह पहल 'Atoms for Peace' विजन के तहत शुरू की गई थी, जिसका लक्ष्य परमाणु ऊर्जा का उपयोग विनाश के बजाय निर्माण कार्यों जैसे- खनन और बुनियादी ढांचे में करना था।
वैज्ञानिकों का मानना था कि परमाणु उपकरण बेहद शक्तिशाली 'अर्थमूवर्स' की तरह काम कर सकते हैं। जो खुदाई मशीनों के जरिए महीनों या सालों में होती, उसे एक परमाणु धमाका पलक झपकते ही लाखों क्यूबिक मीटर मिट्टी और चट्टानों को उड़ाकर कर सकता था।
उस समय पनामा नहर के विकल्प के रूप में कोलंबिया के माध्यम से एक नई समुद्री नहर बनाने पर विचार किया गया था। अनुमान लगाया गया था कि इसके लिए करीब 294 परमाणु विस्फोट करने होंगे, जिनकी कुल शक्ति 16.6 करोड़ टन TNT के बराबर होती। यह अब तक के सबसे बड़े थर्मोन्यूक्लियर बम के परीक्षण से भी तीन गुना अधिक शक्ति थी।
आज क्यों उठ रहा है यह सवाल?
भले ही शीत युद्ध के वे प्लान लैटिन अमेरिका के लिए थे, लेकिन आज उनकी प्रासंगिकता होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मार्गों की संवेदनशीलता के कारण बढ़ गई है। दुनिया की तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज के जरिए गुजरता है। यहां कोई भी व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। जब भी इस क्षेत्र में युद्ध के बादल मंडराते हैं, नीति निर्माताओं के मन में फिर वही सवाल उठता है कि क्या भूगोल को बदलकर कोई वैकल्पिक रास्ता बनाया जा सकता है?
तब मुमकिन था, तो अब क्यों नहीं?
1960 के दशक में परमाणु तकनीक को लेकर दुनिया में एक अलग तरह का उत्साह था। इंजीनियरों का मानना था कि इससे मेगाप्रोजेक्ट्स को बहुत कम समय और लागत में पूरा किया जा सकता है। लेकिन जल्द ही इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गईं:
रेडियोएक्टिव खतरा: परमाणु धमाकों के बाद होने वाला रेडियोएक्टिव कचरा सबसे बड़ी समस्या थी, जो बहुत बड़े इलाके को इंसानों के रहने लायक नहीं छोड़ता।
कानूनी बाधाएं: 1963 की 'लिमिटेड न्यूक्लियर टेस्ट बैन ट्रीटी' ने खुले में या सतह के पास परमाणु धमाकों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
पर्यावरण और जनविरोध: हजारों लोगों का विस्थापन और प्रकृति को होने वाला अपूरणीय नुकसान इस प्रोजेक्ट के आड़े आया। 1970 के दशक तक इन प्रस्तावों को 'जोखिम ज्यादा, फायदा कम' मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।