US China Trade War: अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध (Trade War) एक बार फिर गरमा गया है। यह विवाद तब बढ़ गया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने गुरुवार को चीन समेत दुनिया भर के व्यापारिक साझेदारों पर भारी-भरकम शुल्क लगाने की घोषणा की है। चीन ने अमेरिका के नए टैरिफ पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि वह अपने हितों की सुरक्षा के लिए जवाबी कदम उठाएगा।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि अमेरिका का यह फैसला अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन के खिलाफ है और उसने खुद ही इससे सबसे ज्यादा फायदा उठाया है। लेकिन ट्रंप का नजरिया अलग है। उन्होंने बुधवार को चीन पर 34% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया, जो पहले से मौजूद 20% शुल्क के ऊपर है। अब कुल मिलाकर 54% टैरिफ लग चुका है, जो उस 60% के करीब है जिसका ट्रंप ने अपने चुनावी भाषणों में जिक्र किया था।
US China Trade War: पुराने वादे और नई हकीकत
2020 में चीन और अमेरिका ने 'फेज 1' व्यापार समझौता किया था। इसमें चीन को दो साल में अमेरिकी उत्पादों की खरीद को $200 बिलियन तक बढ़ाने का वादा किया गया था। लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण चीन इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका। 2017 में चीन ने अमेरिका से $154 बिलियन के सामान खरीदे थे, जो 2023 में बढ़कर $164 बिलियन हुआ। लेकिन यह भी ट्रंप के तय किए गए लक्ष्य से काफी कम था।
अब अमेरिका के खिलाफ चीन की क्या रणनीति होगी?
यूरोपीय संघ के चैंबर ऑफ कॉमर्स इन चाइना के अध्यक्ष जेंस एस्केलुंड (Jens Eskelund) का कहना है कि कई कंपनियों ने पहले ही अपने सप्लाई चेन को अमेरिकी-चीन व्यापार तनाव से बचाने के लिए एडजस्ट किया था, लेकिन अब यह बदलाव इतनी जल्दी संभव नहीं होगा। हालांकि, अमेरिकी बाजार से दूरी बनाना चीन के लिए भी आसान नहीं है। वहां हर साल $400 बिलियन से ज्यादा के चीनी उत्पाद बिकते हैं।
ट्रंप बनाम शी जिनपिंग: कौन झुकेगा पहले?
इस साल जून में ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिपनिंग की मुलाकात हो सकती है। इन दोनों की खींचतान को वॉशिंगटन स्थित रिसर्च संस्थान फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के सीनियर फेलो क्रेग सिंगलेटन (Craig Singleton) बड़े अच्छे समझाते हैं। उनका कहना है, 'ट्रंप और शी जिनपिंग एक ऐसे खेल में फंसे हुए हैं, जहां हार मानने वाला कमजोर दिखेगा और ज्यादा देर तक अड़े रहने वाला भारी नुकसान उठा सकता है।'
उन्होंने कहा, 'ट्रंप की रणनीति बहुत अलग है। वह पहले जबरदस्त दबाव बनाते हैं, फिर अचानक बातचीत का प्रस्ताव रखते हैं। उनके लिए ये दोनों चीजें एक साथ चलती हैं। दूसरी ओर, शी जिनपिंग का अंदाज बिल्कुल अलग है। वह धैर्य रखते हैं, रिस्क लेने से बचते हैं और हर कदम सोच-समझकर उठाते हैं।"
लेकिन यहीं असली दुविधा है। अगर शी जिनपिंग बातचीत से बचते हैं, तो अमेरिका का दबाव बढ़ता जाएगा। लेकिन अगर वो जल्दी झुक गए, तो दुनिया के सामने कमजोर दिखेंगे। ट्रंप के लिए भी यही मुश्किल है। वह ये नहीं चाहते कि उनकी छवि ऐसी बने कि चीन ने उन्हें झुका दिया।
इस खींचतान का सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ रहा है। कंपनियां असमंजस में हैं, निवेशक घबराए हुए हैं और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं इस व्यापार युद्ध से प्रभावित हो रही हैं। दोनों ही नेता पहले कदम उठाने से हिचक रहे हैं, लेकिन अगर ये गतिरोध लंबा चला, तो इसका असर और गहरा होगा।