तेल के दाम में आएगा और उबाल! कई गल्फ कंट्रीज ने घटाया उत्पादन, युद्ध संकट गहराने के आसार
पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और हॉर्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल बाजार में उथल पुथल बढ़ गई है। कई गल्फ देशों ने उत्पादन घटाना शुरू कर दिया है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं।
तेल की कीमतों को काबू में रखने के लिए अमेरिका कुछ कदमों पर विचार कर रहा है।
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर अब तेल बाजार पर तेजी से दिखने लगा है। ईरान में जारी संघर्ष और हॉर्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल की सप्लाई पर दबाव बढ़ रहा है। इसके साथ ही अमेरिका भी ईरान में अपने हमले तेज करने पर विचार कर रहा है। इससे हालात और तनावपूर्ण हो सकते हैं।
संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत ने पहले ही तेल उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है क्योंकि उनके स्टोरेज टैंक तेजी से भर रहे हैं। इराक भी ऐसा कर चुका है। अगर टैंकर इसी तरह इस रास्ते से बचते रहे तो दूसरे देश भी उत्पादन घटाने को मजबूर हो सकते हैं। जब टैंकर लोड होकर निकल जाएंगे तो जमीन पर मौजूद स्टोरेज भी तेजी से भरने लगेंगे।
दुनिया के तेल का अहम रास्ता बंद
यह संघर्ष अब नौवें दिन में पहुंच चुका है और इसके जल्द खत्म होने के संकेत नहीं हैं। सामान्य परिस्थितियों में हॉर्मूज जलडमरूमध्य से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की आवाजाही होती है, लेकिन फिलहाल यह रास्ता व्यावसायिक जहाजों के लिए लगभग बंद है।
हालांकि क्षेत्र के करीब एक तिहाई तेल उत्पादन को हॉर्मूज के बिना भी निर्यात किया जा सकता है। सऊदी अरब पहले ही बड़ी मात्रा में कच्चा तेल रेड सी के तट की ओर भेजकर निर्यात कर रहा है।
ईरान का जवाब और अमेरिका की चेतावनी
ईरान ने साफ कहा है कि वह अमेरिकी और इजरायली हमलों के सामने झुकेगा नहीं। ये हमले 28 फरवरी से शुरू हुए थे।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि अब अमेरिका ईरान में ऐसे इलाकों और समूहों को भी निशाना बना सकता है जिन्हें पहले टारगेट नहीं किया गया था। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक ईरान आत्मसमर्पण नहीं करता या पूरी तरह कमजोर नहीं हो जाता।
100 डॉलर के करीब पहुंचा कच्चा तेल
तेल बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा युद्ध कीमतों को एक अहम मोड़ पर ले आया है। कच्चे तेल की कीमतें अब 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब पहुंच रही हैं। ब्रेंट क्रूड पिछले हफ्ते लगभग 30 प्रतिशत बढ़ गया, जो छह साल में सबसे बड़ी तेजी है।
क्षेत्र से जुड़े अन्य तेल बेंचमार्क इससे भी ऊपर निकल चुके हैं। अबू धाबी के Murban क्रूड फ्यूचर्स 103 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुए। ओमान क्रूड फ्यूचर्स 107 डॉलर तक पहुंच गए। वहीं, शंघाई एक्सचेंज में चीनी क्रूड फ्यूचर्स लगभग 109 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुए।
तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ता खतरा
तेल से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का खतरा भी बढ़ रहा है। सऊदी अरब ने सप्ताहांत में उन ड्रोन को मार गिराया जो रोजाना करीब 10 लाख बैरल उत्पादन वाले Shaybah ऑयल फील्ड की ओर बढ़ रहे थे।
बहरीन और कतर में भी हमले जारी रहने की खबरें हैं। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि तेल सप्लाई में बाधा केवल कुछ दिनों की नहीं बल्कि लंबी अवधि की भी हो सकती है।
हॉर्मूज से गुजरने से बच रहे जहाज
पिछले कुछ दिनों में हॉर्मूज जलडमरूमध्य से केवल ईरान से जुड़े टैंकर और दो बल्क कैरियर जहाज गुजरते देखे गए हैं। बाकी अधिकांश जहाज इस रास्ते से बच रहे हैं।
अमेरिका ने जहाजों के लिए वित्तीय सुरक्षा बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर सैन्य सुरक्षा देने का वादा किया है। इसके लिए पर्शियन गल्फ क्षेत्र में समुद्री बीमा की व्यवस्था भी शुरू की गई है, जो लगभग 20 अरब डॉलर तक के नुकसान को कवर करेगी।
जहाज मालिकों की सबसे बड़ी चिंता
हालांकि जहाज मालिकों के लिए सबसे बड़ी चिंता बीमा की लागत नहीं बल्कि जहाज और चालक दल की सुरक्षा है।
उनका कहना है कि जहाजों को सुरक्षित रूप से चलाने के लिए पूरी नौसैनिक सुरक्षा की जरूरत है, जैसा कि रेड सी में जहाजों की सुरक्षा के लिए चलाए गए Operation Prosperity Guardian अभियान में किया गया था। या फिर सबसे अच्छा समाधान यह होगा कि युद्ध समाप्त हो जाए।
कीमतों को काबू में रखने की कोशिश
तेल की कीमतों को काबू में रखने के लिए अमेरिका कुछ कदमों पर विचार कर रहा है। इसमें भारत को क्षेत्र में स्टोरेज में रखे रूसी तेल तक पहुंच देने की अनुमति भी शामिल है।
इसके अलावा अमेरिका अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का इस्तेमाल करने या फ्यूचर्स बाजार में हस्तक्षेप करने पर भी विचार कर चुका है। हालांकि बाद में अधिकारियों ने इन विकल्पों को कम महत्व दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी अस्थायी है और समय के साथ यह फिर कम हो सकती हैं।
एशिया पर सबसे ज्यादा असर
तेल आयात पर निर्भर एशियाई देशों पर इसका असर सबसे पहले दिखाई दे रहा है। जापान, जो अपने 90 प्रतिशत से ज्यादा तेल मध्य पूर्व से आयात करता है, वहां की रिफाइनरियां राष्ट्रीय तेल भंडार का इस्तेमाल करने का विकल्प मांग रही हैं।
चीन ने घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए ईंधन निर्यात कम कर दिया है। वहीं दक्षिण कोरिया 30 साल बाद फिर से तेल की कीमतों पर सरकारी सीमा तय करने पर विचार कर रहा है।
यूरोप में भी असर
उत्तर पश्चिमी यूरोप में जेट फ्यूल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। गुरुवार को जेट फ्यूल की कीमत 1,528 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई, जो प्रति बैरल लगभग 190 डॉलर के बराबर है। इसकी बड़ी वजह यह है कि यूरोपीय संघ के जेट फ्यूल आयात का लगभग आधा हिस्सा हॉर्मूज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
आगे क्या हो सकता है?
ING बैंक के विश्लेषकों के मुताबिक फिलहाल सबसे संभावित स्थिति यह है कि सप्लाई में करीब चार हफ्तों तक व्यवधान बना रह सकता है। इसमें दो हफ्ते पूरी तरह बाधित सप्लाई और दो हफ्ते लगभग आधी सप्लाई रहने की संभावना है।
हालांकि अगर अमेरिकी और इजरायली हमले ईरान की जहाजों पर हमला करने की क्षमता को कमजोर कर देते हैं, तो धीरे धीरे तेल की सप्लाई सामान्य हो सकती है। लेकिन, सबसे खराब स्थिति में अगर तीन महीने तक तेल और गैस की सप्लाई बाधित रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतें नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती हैं।
Disclaimer:यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।