Explained: क्या पश्चिम एशिया में हो जाएगी पानी की किल्लत? तेल से शुरू हुआ युद्ध वाटर प्लांट्स तक पहुंचा
पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान के बीच युद्ध अब तेल ठिकानों से आगे बढ़कर पानी के डीसैलिनेशन प्लांट तक पहुंच गया है। अगर ये प्लांट प्रभावित हुए तो खाड़ी देशों में पीने के पानी की गंभीर किल्लत पैदा हो सकती है। जानिए डिटेल।
कई खाड़ी देशों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले पानी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा डीसैलिनेशन प्लांट्स से ही आता है।
पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। इजरायल और ईरान अब केवल सैन्य ठिकानों पर ही नहीं, बल्कि उन अहम ढांचों को निशाना बना रहे हैं जिन पर आम लोगों की जिंदगी और अर्थव्यवस्था टिकी होती है। पहले दोनों पक्षों ने तेल डिपो और फ्यूल स्टोरेज को निशाना बनाया, लेकिन अब हमले पानी की सप्लाई से जुड़े सिस्टम तक पहुंच गए हैं।
यह स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि इस क्षेत्र के करोड़ों लोग पीने के पानी के लिए समुद्र के पानी को साफ करके बनाए जाने वाले पानी यानी डीसैलिनेशन पर निर्भर हैं। ऐसे में डीसैलिनेशन प्लांट्स पर हमला संघर्ष को और खतरनाक बना सकता है।
तेल डिपो से पानी के सिस्टम तक
हाल ही में इजरायल ने ईरान के फ्यूल स्टोरेज ठिकानों पर हमले किए, जिससे वहां बड़े पैमाने पर आग लग गई और आसमान में धुएं के गुबार दिखाई दिए। मध्य पूर्व में युद्ध के दौरान तेल डिपो और स्टोरेज टैंक हमेशा से रणनीतिक लक्ष्य रहे हैं क्योंकि ये अर्थव्यवस्था और सैन्य लॉजिस्टिक्स दोनों के लिए बेहद जरूरी होते हैं। लेकिन अब ईरान की प्रतिक्रिया ने एक और संवेदनशील क्षेत्र को सामने ला दिया है।
बहरीन के अधिकारियों के अनुसार ईरान से जुड़े एक ड्रोन हमले में एक डीसैलिनेशन प्लांट को नुकसान पहुंचा है। मौजूदा संघर्ष में यह पहली घटनाओं में से एक है जब सीधे पीने के पानी से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया। इससे यह भी साफ हुआ कि खाड़ी देशों के शहर ऐसे हमलों के लिए कितने संवेदनशील हैं।
जीवन रेखाओं पर लड़ी जा रही जंग
पर्शियन गल्फ क्षेत्र को भले ही तेल संपदा के लिए जाना जाता हो, लेकिन यहां जीवित रहने के लिए डीसैलिनेशन प्लांट बेहद जरूरी हैं। कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश अपने पीने के पानी का बड़ा हिस्सा समुद्र के पानी को साफ करके ही प्राप्त करते हैं। तटीय इलाकों में बने ये प्लांट बड़ी मात्रा में ऊर्जा का इस्तेमाल करके समुद्री पानी को मीठे पानी में बदलते हैं।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर इन प्लांट्स में से कुछ को भी नुकसान पहुंचा तो कुछ ही दिनों में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है। कई खाड़ी देशों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले पानी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा डीसैलिनेशन से ही आता है। ऐसे में अगर ये प्लांट बंद हो जाएं या बिजली की सप्लाई बाधित हो जाए तो शहरों के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचते।
दुनिया के सबसे बड़े डीसैलिनेशन प्लांट
खाड़ी देशों में दुनिया के कुछ सबसे बड़े डीसैलिनेशन प्लांट मौजूद हैं, जो हर दिन लाखों घन मीटर ताजा पानी तैयार करते हैं और रेगिस्तानी इलाकों में बसे शहरों की जरूरत पूरी करते हैं।
सऊदी अरब में Ras Al Khair पावर और डीसैलिनेशन प्लांट दुनिया का सबसे बड़ा प्लांट माना जाता है। इसकी क्षमता लगभग 2.99 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है। इसके अलावा Jubail प्लांट, जेद्दा के पास Shuaiba-3 और Al Khobar 2 भी प्रमुख प्लांट हैं।
संयुक्त अरब अमीरात में दुबई का Jebel Ali डीसैलिनेशन कॉम्प्लेक्स लगभग 2.2 मिलियन घनमीटर प्रतिदिन पानी बनाता है। अबू धाबी का Taweelah रिवर्स ऑस्मोसिस प्लांट, Fujairah प्लांट और Umm Al Quwain प्लांट भी अहम कड़ी हैं। कतर में Umm Al Houl, Ras Abu Fontas और Ras Laffan प्रमुख प्लांट हैं।
कुवैत में Az Zour North प्लांट की क्षमता लगभग 486,000 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है। वहीं, Doha East और West प्लांट के साथ Shuaiba प्लांट की क्षमता भी काफी अधिक है। बहरीन के पास Al Hidd और Al Dur प्लांट हैं। वहीं, ओमान में मस्कट के पास Barka और Al Ghubrah प्लांट हैं। इन सभी प्लांट्स पर मिलकर खाड़ी देशों की जल आपूर्ति टिकी हुई है। कई देशों में पीने के पानी का 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं प्लांट्स से आता है।
यह रणनीति क्यों अपना रहा ईरान?
विशेषज्ञों का कहना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते हमले गैर-बराबरी वाले युद्ध (Asymmetric Warfare) की रणनीति को दिखाते हैं। इसका मतलब है ऐसा युद्ध जिसमें दोनों पक्ष ताकत, संसाधन, तकनीक या सैन्य क्षमता में बराबर नहीं होते। यानी एक पक्ष बहुत शक्तिशाली होता है और दूसरा अपेक्षाकृत कमजोर।
ईरान सीधे सैन्य टकराव में इजरायल की तकनीकी क्षमता और वायु शक्ति का मुकाबला नहीं कर सकता। ऐसे में वह क्षेत्र के कमजोर ढांचों जैसे बंदरगाह, ऊर्जा और जल आपूर्ति सिस्टम को निशाना बनाकर दबाव बना सकता है। डीसैलिनेशन प्लांट खास तौर पर संवेदनशील लक्ष्य होते हैं।
ठप हो सकती है पानी की सप्लाई?
ये समुद्र तट पर बड़े औद्योगिक परिसरों में फैले होते हैं। बिजली, समुद्री पानी की पाइपलाइन और फिल्ट्रेशन सिस्टम जैसे कई जुड़े हुए सिस्टम पर निर्भर रहते हैं।अगर इस सिस्टम की किसी एक कड़ी को भी नुकसान पहुंचा तो पूरे शहर की जल आपूर्ति रुक सकती है। तेल की तरह पानी को आसानी से दूसरे देशों से आयात नहीं किया जा सकता। रेगिस्तानी इलाकों में बसे शहर पीने के पानी, साफ सफाई और उद्योग के लिए लगभग पूरी तरह डीसैलिनेशन पर निर्भर हैं।
अगर बड़े प्लांट लंबे समय तक बंद हो जाएं तो सरकारों को कड़ी पानी की राशनिंग लागू करनी पड़ सकती है या आपातकालीन पानी आयात करना पड़ सकता है। सबसे खराब स्थिति में इससे लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है।