West Asia Conflict: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब केवल सैन्य या राजनीतिक संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह तेजी से एक वैश्विक खाद्य आपातकाल का रूप ले रहा है। खाद की कमी, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और सप्लाई चेन में रुकावटें मिलकर दुनिया के सामने रिकॉर्ड तोड़ महंगाई और भूखमरी का खतरा पैदा कर सकती हैं। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के एक लेटेस्ट विश्लेषण से बेहद डरावने आंकड़े सामने आए है।
4.5 करोड़ लोग भुखमरी की कगार पर!
WFP की रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह संघर्ष जून तक जारी रहता है, तो दुनिया में 4.5 करोड़ लोग गंभीर भूख का शिकार हो सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर भूखे लोगों की कुल संख्या 31.9 करोड़ के पार पहुंच सकती है। 28 फरवरी से जारी हमलों के कारण मानवीय सहायता (Aid) पहुंचाने वाले समुद्री रास्ते बंद हो गए हैं, जिससे जरूरतमंदों तक खाना नहीं पहुंच पा रहा है।
तेल नहीं, 'उर्वरक' है असली चिंता
होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से सिर्फ पेट्रोल महंगा नहीं हुआ है, बल्कि खेती की नींव हिल गई है। दुनिया में व्यापार होने वाले कुल यूरिया का लगभग आधा हिस्सा इसी खाड़ी क्षेत्र से आता है। कतर की फर्टिलाइजर कंपनी दुनिया का 14% यूरिया बनाती है। गैस की कमी और हमलों के कारण कतर और खाड़ी के अन्य देशों ने खाद का उत्पादन रोक दिया है या कम कर दिया है। मिडिल ईस्ट से आने वाली खाद की कीमतें पिछले कुछ हफ्तों में 40% तक बढ़ गई हैं।
यह संकट ऐसे समय आया है जब उत्तरी गोलार्ध जिसमें भारत भी आता है, में बुवाई का मुख्य सीजन चल रहा है। फरवरी के मध्य से मई की शुरुआत तक किसान फसलों में सबसे ज्यादा खाद का इस्तेमाल करते हैं। खाद महंगी होने के कारण किसान इसका इस्तेमाल कम करेंगे, जिससे चावल, गेहूं और मक्का जैसी बुनियादी फसलों की पैदावार गिर जाएगी।
भारत और ब्राजील जैसे बड़े उत्पादक 'डेंजर जोन' में
खाद के लिए खाड़ी देशों पर निर्भरता दुनिया के बड़े अन्नदाताओं को संकट में डाल रही है। भारत अपनी जरूरत का 40% से ज्यादा फर्टिलाइजर मिडिल ईस्ट से मंगाता है। गैस की कमी से भारत के कई यूरिया प्लांट में उत्पादन 70% तक गिर गया है। दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन निर्यातक ब्राजील लगभग पूरी तरह विदेशी खाद पर निर्भर है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज से होकर आता है। हालात को देखते हुए चीन ने अपने सुरक्षित भंडार से खाद निकालना शुरू कर दिया है।
महंगाई के साथ सामाजिक अशांति का खतरा
खेती की लागत बढ़ने का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। भारत जैसे देशों में खाद महंगी होने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। जब अनाज कम पैदा होगा, तो कीमतें आसमान छुएंगी। गरीब देशों में बढ़ती खाद्य कीमतें अक्सर दंगों और सामाजिक अशांति का कारण बनती हैं, जो एक खतरनाक स्थिति है।