South Korea के पूर्व राष्ट्रपति यून सुक-योल को आजीवन कारावास, मार्शल लॉ थोपने की साजिश पर अदालत का बड़ा फैसला

South Korea में कानून और लोकतंत्र की ताकत का बड़ा उदाहरण सामने आया है। सियोल सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति यून सुक योल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने उन्हें दिसंबर 2024 में मार्शल लॉ थोपने की कोशिश और विद्रोह का दोषी पाया।

अपडेटेड Feb 19, 2026 पर 7:13 PM
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दक्षिण कोरिया की अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति यून सुक योल को आज उम्रकैद की सजा सुनाई। सियोल सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने उन्हें दिसंबर 2024 में आपातकाल घोषित करने और विद्रोह भड़काने का दोषी ठहराया। जज जी क्वी-यॉन ने फैसले में कहा कि यून के कदमों ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे को गहरा आघात पहुंचाया। अभियोजकों ने फांसी की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उम्रकैद चुनी।

3 दिसंबर 2024 की वो काली रात यादें ताजा कर देती है। यून ने राष्ट्रपति भवन से अचानक मार्शल लॉ की घोषणा की, सेना को संसद घेरने और सांसदों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। उनका दावा था कि विपक्षी नेता "उत्तर कोरियाई कम्युनिस्टों" से सांठगांठ कर रहे हैं। लेकिन संसद ने महज छह घंटे बाद इसे रद्द कर दिया। ये कोशिश सत्ता हथियाने का नंगा खेल था, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। यून ने न्यायपालिका पर कब्जा करने की साजिश रची।

65 साल के यून ने कोर्ट में पेश होना तक मना कर दिया। जज ने कहा, "उनके चेहरे पर कोई पश्चाताप नहीं दिखा।" पूर्व रक्षा मंत्री किम योंग-ह्यून को 30 साल की सजा मिली। यून पहला बैठे हुए राष्ट्रपति बने, जिन्हें गिरफ्तार किया गया - 3,000 पुलिसकर्मियों ने घेराबंदी की। इससे पहले जनवरी में उन्हें पांच साल की सजा हुई थी। पूर्व पीएम हान डक-सू को 23 साल और अन्य मंत्रियों को भी लंबी सजाएं।


अदालत के बाहर यून के समर्थक सड़कों पर उतर आए और नारेबाजी कर रहे थे। यून अपनी बेगुनाही पर अड़े हैं और कहते हैं ये "फ्रीडम बचाने" का कदम था। लेकिन फैसला साफ है। कानून के सामने कोई बड़ा नहीं। दक्षिण कोरिया ने 1997 के बाद पहली बार इतनी सख्त कार्रवाई की। एमनेस्टी ने इसे जवाबदेही की दिशा बताया। यून को अपील का हक है, लेकिन ये सजा लोकतंत्र की जीत है।

यून सुक योल कभी देश के सबसे ताकतवर नेता थे, लेकिन सत्ता के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश ने उन्हें आजीवन कारावास तक पहुंचा दिया। यह घटना न सिर्फ दक्षिण कोरिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक सबक है कि लोकतंत्र में किसी भी नेता की शक्ति सीमित होती है और जनता की आवाज़ सबसे बड़ी होती है।

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