Iran Crisis: ईरान संकट की क्या है वजह, क्या चाहते हैं अमेरिका और इजरायल? समझिए हर एक पहलू

Iran Crisis: ईरान में घरेलू संकट लगातार बढ़ रहा है। जनता और कारोबारी सत्ता के खिलाफ सड़कों पर उतर गए हैं। जानकारों के मुताबिक, इस विरोध को अमेरिका और इजरायल से भी हवा मिल रही है। लेकिन, ईरान मुद्दे पर अमेरिका और इजरायल भी एकमत नहीं हैं। समझिए पूरा मामला।

अपडेटेड Jan 11, 2026 पर 8:25 PM
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ईरान में भारी महंगाई और करेंसी की गिरती वैल्यू ने विरोध का दायरा बढ़ा दिया है।

Iran Crisis: ईरान में गहराती अशांति ने अमेरिका और इजराइल के बीच एक साफ रणनीतिक अंतर को सामने ला दिया है। दोनों देश ईरान पर दबाव बढ़ा रहे हैं, लेकिन उनके मकसद अलग हैं।

पूर्व राजनयिक Anil Trigunayat के मुताबिक, अमेरिका इस संकट का इस्तेमाल ईरान को फिर से परमाणु समझौते की बातचीत में लाने के लिए करना चाहता है। वहीं, इजराइल इसे ईरान के मौजूदा नेतृत्व को हटाने का सुनहरा मौका मान रहा है।

ईरान में मौजूदा संकट की क्या वजह है?


अनिल त्रिगुणायत का कहना है कि मौजूदा हालात ईरानी शासन के लिए कई दशकों में सबसे गंभीर चुनौती हैं। इसकी जड़ में आर्थिक बदहाली, राजनीतिक असंतोष और सामाजिक उथल-पुथल का मेल है।

उन्होंने कहा, 'इसमें कोई शक नहीं कि ईरान में आर्थिक समस्या बेहद गंभीर है। यह अब सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संकट में बदल चुकी है।' त्रिगुणायत ने बताया कि प्रतिबंधों, भ्रष्टाचार और खराब प्रशासन की वजह से यह संकट पिछले दस साल से धीरे-धीरे गहराता रहा है।

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महंगाई से जनता-कारोबारी सड़क पर

ईरान में भारी महंगाई और करेंसी की गिरती वैल्यू ने विरोध का दायरा बढ़ा दिया है। पहले यह गुस्सा शहरी गरीबों तक सीमित था। लेकिन, अब मिडिल क्लास और बाजार से जुड़े लोग भी इसमें शामिल हो गए हैं।

त्रिगुणायत ने कहा, 'करेंसी में भारी गिरावट ने बाजारियों और मिडिल क्लास को भी विरोध में खड़ा कर दिया। सरकार की तरफ से दी गई सब्सिडी और अस्थायी राहतें भरोसा लौटाने में नाकाम रही हैं।'

महंगाई से आगे बढ़ चुका सवाल

ईरान में स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि लोगों का गुस्सा अब सिर्फ आर्थिक परेशानियों तक सीमित नहीं है। अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या मौजूदा शासन हालात संभाल भी सकता है या नहीं।

त्रिगुणायत के मुताबिक, 'लोगों को लगने लगा है कि शासन आर्थिक संकट से निपटने में सक्षम नहीं है।'

अमेरिका और इजराइल की भूमिका

त्रिगुणायत का कहना है कि इस अशांति में बाहरी ताकतों की भूमिका भी है, खासकर अमेरिका और इजराइल की। हालांकि, दोनों के लक्ष्य अलग-अलग हैं।

उन्होंने कहा, 'इन विरोध प्रदर्शनों को काफी हद तक अमेरिका और इजराइल ने भी हवा दी है। दोनों ने ईरान को चेतावनी दी है कि वह प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग न करे।'

नेतन्याहू ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि वह गाजा बंधकों पर आज या कल बयान देंगे।

शासन बदलने की बात कर रहा इजराइल

इजराइल का रुख अमेरिका से ज्यादा आक्रामक है। त्रिगुणायत के मुताबिक, 'इजराइली प्रधानमंत्री खुलकर लोगों से शासन को उखाड़ फेंकने की अपील कर रहे हैं।'

उनका मानना है कि इजराइल इस अशांति को एक ऐतिहासिक मौका मानता है, ताकि उस नेतृत्व को हटाया जा सके जिसे वह अपने लिए स्थायी खतरा मानता है। उन्होंने ईरान-इजराइल टकराव को दोनों तरफ की 'पागलपन भरी सोच' से भरा संघर्ष बताया।

अमेरिका का लक्ष्य है दबाव बनाना

इसके उलट, अमेरिका का नजरिया ज्यादा व्यवहारिक है। त्रिगुणायत ने कहा, 'असल में अमेरिका चाहता है कि ईरान फिर से बातचीत की मेज पर आए और परमाणु समझौते पर अमेरिका की शर्तों पर चर्चा करे।'

यानी अमेरिका के लिए यह संकट शासन गिराने का नहीं, बल्कि दबाव बनाने का हथियार है।

उल्टा असर डाल सकती हैं ट्रंप की चेतावनियां

ईरान में प्रदर्शनकारियों के साथ बर्ताव को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की चेतावनियों ने हालात को और पेचीदा बना दिया है।

त्रिगुणायत का मानना है कि ऐसी बयानबाजी कट्टरपंथियों को कमजोर करने के बजाय और मजबूत कर सकती है। उन्होंने कहा, 'जब भीड़ सड़कों पर होती है, तो वह तुरंत समाधान चाहती है। बाहरी धमकियां समाज को और ज्यादा बांट देती हैं।'

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सख्ती के बजाय बढ़ सकता है सत्ता का केंद्रीकरण

त्रिगुणायत ने यह भी कहा कि ट्रंप ने हाल में यह स्वीकार किया है कि कुछ मौतें भगदड़ के कारण हुईं, न कि सीधे सरकारी हिंसा से। इससे शासन को थोड़ी राहत मिलती है।

लेकिन खतरा बना रहता है। त्रिगुणायत का कहना है कि अब सरकारी सख्ती के समर्थक और ज्यादा एकजुट हो जाएंगे, क्योंकि बाहरी दबाव अक्सर सख्ती को सही ठहराने का बहाना बन जाता है।

क्या शासन गिरेगा या अंदर से बदलेगा

इतनी उथल-पुथल के बावजूद त्रिगुणायत मानते हैं कि ईरानी शासन के पास अभी भी ताकत है, खासकर रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और बसिज के जरिए। उन्होंने कहा, 'सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और बसिज कैसे बर्ताव करते हैं।' अगर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, तो हालात पूरी तरह बदल सकते हैं।

रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की सबसे ताकतवर सुरक्षा फोर्स है, जो इस्लामिक शासन और सुप्रीम लीडर की रक्षा करती है। इसकी सेना, राजनीति व अर्थव्यवस्था में गहरी पकड़ रखती है। बसिज (Basij) इसी गार्ड्स के तहत काम करने वाली अर्धसैनिक स्वयंसेवी ताकत है, जो सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन रोकने और भीड़ को नियंत्रित करने का काम करती है।

सत्ता पूरी तरह न गिरे, तो भी असर दिखेगा

त्रिगुणायत ने यह संभावना भी जताई कि शासन पूरी तरह गिरने के बजाय अंदर ही अंदर बदल सकता है। उनके मुताबिक, 'राजनीतिक ताकत सुप्रीम लीडर से हटकर संसद और राष्ट्रपति की ओर जा सकती है।' यह बदलाव स्थायी नहीं, बल्कि एक अस्थायी राहत हो सकता है।

त्रिगुणायत ने साफ कहा कि ईरान की मौजूदा हालत की सबसे बड़ी वजह दशकों से चले आ रहे प्रतिबंध हैं। उन्होंने कहा, '40 साल से चले आ रहे प्रतिबंधों ने ईरान की आर्थिक नींव को कमजोर कर दिया है।'

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ईरान अकेला नहीं है, लेकिन दबाव भारी

ईरान को चीन और रूस का समर्थन जरूर हासिल है। त्रिगुणायत ने बताया कि दोनों देश खुले तौर पर ईरान के साथ खड़े हैं और संयुक्त नौसैनिक अभ्यास भी कर रहे हैं। फिर भी, हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं।

त्रिगुणायत के मुताबिक, 'स्थिति अभी भी अस्थिर है और लगातार बदल रही है। आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि संकट किस दिशा में जाता है।' उनका आकलन है कि सबसे ज्यादा संभावना यही है कि इस बार भी शासन बच जाएगा। लेकिन वह पहले से कहीं ज्यादा कमजोर और दबाव में होगा।

दुनिया के लिए क्यों अहम है यह संकट

ईरान को लेकर अमेरिका और इजराइल के बीच मतभेद सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं हैं। इसका असर तेल बाजारों, समुद्री व्यापार मार्गों और पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता पर पड़ सकता है।

त्रिगुणायत के मुताबिक, अमेरिका परमाणु वार्ता को लेकर दबाव बना रहा है, जबकि इजराइल शासन परिवर्तन चाहता है। यही टकराव इस संकट को अलग-अलग दिशाओं में खींच रहा है।

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