तेल के बाद दुनिया का 'इंटरनेट शटडाउन' करने वाला है ईरान! नए प्लान से गूगल, मेटा और अमेजन में मचेगी तबाही? समझें पूरा खेल
Hormuz Digital Chokepoint: इस डिजिटल युद्ध का सबसे बड़ा खामियाजा भारत को भुगतना पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत का यूरोप और अमेरिका जाने वाला एक बहुत बड़ा इंटरनेट ट्रैफिक इसी खाड़ी क्षेत्र और लाल सागर के नीचे से गुजरने वाली केबल्स पर निर्भर करता है। अगर ईरान इन केबल्स के रखरखाव में अड़ंगा लगाता है, तो भारत में करोड़ों यूजर्स के लिए क्लाउड सर्विसेज, ऑनलाइन पेमेंट ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की रफ्तार सुस्त पड़ जाएगी
अब ईरान ने एक ऐसा 'मास्टरप्लान' तैयार किया है, जिससे दुनिया भर में इंटरनेट का चक्का जाम हो सकता है
Hormuz Crisis: मिडिल ईस्ट में जारी सैन्य तनातनी अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है, जो सीधे आपकी डिजिटल लाइफ को ठप कर सकती है। अब तक दुनिया सिर्फ इस बात से डरी हुई थी कि होर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल की सप्लाई रुक जाएगी और पेट्रोल-डीजल महंगा हो जाएगा। लेकिन अब ईरान ने एक ऐसा 'मास्टरप्लान' तैयार किया है, जिससे दुनिया भर में इंटरनेट का चक्का जाम हो सकता है।
ईरानी मीडिया और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि तेहरान अब होर्मुज के नीचे बिछी उन समुद्री फाइबर-ऑप्टिक केबल्स पर अपना कंट्रोल बढ़ाना चाहता है, जो पूरी दुनिया का डिजिटल डेटा ट्रांसफर करती हैं। अगर ऐसा होता है, तो गूगल, मेटा, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज टेक कंपनियों का पूरा साम्राज्य हिल जाएगा।
तेल नहीं, डेटा है नया चोकपॉइंट!
अक्सर लोग सोचते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट के जरिए हवा में तैरता है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। दुनिया का 95% से ज्यादा इंटरनेट डेटा समुद्र की लहरों के नीचे बिछी बेहद पतली फाइबर-ऑप्टिक केबल्स के जरिए एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक सफर करता है।
होर्मुज जलमार्ग सिर्फ तेल टैंकरों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक डेटा रूट के लिए भी दुनिया का सबसे संवेदनशील 'डिजिटल चोकपॉइंट' है। IRGC का तर्क है कि चूंकि ये केबल्स ईरान की समुद्री सीमा के करीब से गुजरती हैं, इसलिए तेहरान को इन पर टैक्स वसूलने, ऑपरेटरों को रेगुलेट करने और केबल की मरम्मत व मेंटेनेंस के काम की निगरानी करने का पूरा हक है। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी टेक कंपनियों ने सहयोग नहीं किया, तो इस रूट के डिजिटल ट्रैफिक को ब्लॉक या बाधित किया जा सकता है।
बिग टेक कंपनियां क्यों हैं निशाने पर?
पिछले एक दशक में गूगल, मेटा, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने अपने क्लाउड स्टोरेज, एआई वर्कलोड और हाई-स्पीड डेटा के लिए समुद्र के नीचे खुद के प्राइवेट केबल नेटवर्क बिछाने में अरबों डॉलर का निवेश किया है।
अगर खाड़ी देशों के इस समुद्री रूट में जरा सी भी गड़बड़ी होती है, तो सिर्फ फेसबुक-व्हाट्सएप या इंस्टाग्राम ही धीमे नहीं होंगे, बल्कि दुनिया भर के बैंकिंग सिस्टम, शेयर बाजार, एयरलाइंस लॉजिस्टिक्स और क्लाउड सर्वर्स पूरी तरह ठप हो सकते हैं। यही वजह है कि रक्षा विशेषज्ञ अब इन अंडरसी केबल्स को बिजली ग्रिड और तेल पाइपलाइनों की तरह 'क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर' मान रहे हैं।
भारत पर कैसे पड़ेगा इसका असर?
इस डिजिटल युद्ध का सबसे बड़ा खामियाजा भारत को भुगतना पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत का यूरोप और अमेरिका जाने वाला एक बहुत बड़ा इंटरनेट ट्रैफिक इसी खाड़ी क्षेत्र और लाल सागर के नीचे से गुजरने वाली केबल्स पर निर्भर करता है।
अगर ईरान इन केबल्स के रखरखाव में अड़ंगा लगाता है, तो भारत में करोड़ों यूजर्स के लिए क्लाउड सर्विसेज, ऑनलाइन पेमेंट ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की रफ्तार सुस्त पड़ जाएगी।
इसके अलावा, यूएई और सऊदी अरब इस समय अमेरिकी कंपनियों के सहयोग से दुनिया के सबसे बड़े डेटा और एआई हब बन रहे हैं। ईरान की इस नई चाल से मिडिल ईस्ट का पूरा टेक-इकोसिस्टम खतरे में पड़ जाएगा।
क्या वाकई दुनिया का इंटरनेट काट सकता है ईरान?
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत इन केबल्स को सुरक्षा मिली हुई है और इन्हें कई देशों के ग्रुप मिलकर चलाते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान शायद पूरी तरह से इंटरनेट केबल्स को काटेगा नहीं, क्योंकि यह सीधे तौर पर विश्व युद्ध को न्योता देने जैसा होगा।
लेकिन, समुद्र के नीचे केबल्स की मरम्मत करना बेहद जटिल और खर्चीला काम होता है। मेंटेनेंस जहाजों को वहां जाने के लिए सुरक्षा और मंजूरी की जरूरत होती है। ईरान सिर्फ इन जहाजों को रोककर, मंजूरी में देरी करके या सुरक्षा का डर दिखाकर ही इन कंपनियों पर भारी कूटनीतिक दबाव बना सकता है। इससे केबल्स का इंश्योरेंस खर्च बढ़ जाएगा और टेक कंपनियों को अपने रूट बदलने पर मजबूर होना पड़ेगा।