ईरान की राजधानी तेहरान के अस्पताल शवों से भरे पड़े हैं। सड़कों से शव हटाने के लिए बुलडोजर मशीनें चल रही हैं। परिवारों को अपने बच्चों को मारने वाली गोलियों का पैसा चुकाना पड़ रहा है। भारत में रहने वाले ईरानियों का कहना है कि घरवालों से ऐसी खबरें आ रही हैं।
TOI के मुताबिक, अबगिने खाकी तेहरान की रहने वाली हैं। अब वे भारत के दक्षिण के एक शहर में रहती हैं। उन्होंने बताया कि मंगलवार शाम को माता-पिता से बात हुई। वे सुरक्षित हैं, लेकिन चारों तरफ लोगों की लाशे हैं।
वह कहती हैं, "पापा ने कहा अस्पताल शवों से भरे हैं। सरकार सड़कें साफ करने के लिए बुलडोजर चला रही है। शव परिवार को तभी दिए जा रहे हैं, जब वो 500 मिलियन टोमन (लगभग 4,000 डॉलर या 3.6 लाख रुपए) चुकाएं। कुछ अफसर गोलियों का दाम भी मांग रहे हैं। ऐसी सरकार अपने लोगों के साथ क्या करता है?"
प्रदर्शन, जो सत्ता के खिलाफ शुरू हुए थे, अब वे ईरानियों जिंदा रहने की लड़ाई बन गए हैं। खाकी ने कहा, "लोग रोटी-अंडे भी नहीं खरीद पा रहे। मां-बाप को अफसोस है कि पहले आवाज नहीं उठाई। अब वे हमारा साथ दे रहे हैं। हम इस सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। किसी भी कीमत पर।"
बहर घोरबानी हाल ही में भारत से फिनलैंड गई हैं। मंगलवार को थोड़ी देर के लिए अंतरराष्ट्रीय कॉल चली। वे रिश्तेदारों से 30 सेकंड बात कर पाईं। अभी भी नहीं पता माता-पिता तेहरान में ठीक हैं या नहीं। उन्होंने कहा, "हर दिन दोपहर 3 बजे से सुबह तक कर्फ्यू है। रेवोल्यूशनरी गार्ड सड़कों पर हैं, लेकिन लोग फिर भी निकल आते हैं। वे जानते हैं मर सकते हैं, लेकिन आते हैं।" उन्होंने कहा कि सुरक्षाबल अब पेलेट गन नहीं चला रहे। "अब असली गोलियां चला रहे हैं। महिलाओं-बच्चों को भी नहीं बख्श रहे।"
नई दिल्ली में बुधवार को ईरानी दूतावास के बाहर ईरानी जमा हुए। वे 1979 से पहले का राष्ट्रीय झंडा लहरा रहे थे, जिसमें शेर और सूरज का चिन्ह है। यह छोटा विरोध था, लेकिन जरूरी। मोहम्मद नाम के प्रदर्शनकारी ने फोन पर कहा, "हम भाई-बहनों के लिए आवाज उठाने आए। भारतीयों को पता चले क्या हो रहा है। उनका साथ चाहिए।"
ईरान में भारतीय दूतावास ने बुधवार को सलाह दी। सभी भारतीय नागरिक- छात्र और तीर्थयात्री- जल्दी निकल जाएं। कोई भी साधन इस्तेमाल करें, जैसे कमर्शियल फ्लाइट। ईरान में कम से कम 3,000 भारतीय छात्र हैं, जिनमें 2,300 कश्मीर से हैं।
कुछ परिवारों ने इस हफ्ते बच्चों से बात की। सभी ने एक ही बात कही, हॉस्टल में बंद हैं, बाहर नहीं निकले। श्रीनगर के मोहम्मद अमीन भट की बेटी शिराज में मेडिसिन पढ़ रही है। उन्होंने कहा, "सलाह से चिंता बढ़ गई। फ्लाइट महंगी हैं। इंटरनेट बंद होने से टिकट भी नहीं भेज पा रहे। बस कहते हैं सुरक्षित रहो।"
शामिक परवेज भी श्रीनगर से हैं। उनकी 19 साल की कजिन दिसंबर में तेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज में पढ़ने गई। उन्होंने कहा, "हमें पता ही नहीं वह सलाह देख पाई या नहीं। ट्विटर पर डाली गई थी, लेकिन अब कौन देख पा रहा है? भारत सरकार को आगे आना चाहिए।"