Iran Protests: अली खामेनेई की सत्ता गई, तो कौन संभालेगा ईरान की कमान?
Iran Crisis: दुनिया भर के नेता सोच रहे हैं कि इस्लामिक गणराज्य में अब सत्ता पलट सकती है। यह ऐतिहासिक घटना होगी, जो वैश्विक राजनीति और तेल बाजार को बदल देगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में ईरान में इस्लामिक शासन बदल जाएगा, अगर हां, तो उसकी जगह कौन ले सकता है
Iran Protest: अगर अली खामेनेई की सत्ता गई, तो कौन संभालेगा ईरान की कमान?
ईरान संकट के कगार पर है। पिछले कुछ दिनों से देश के कई शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। कुछ लोग इसे 40 साल पुरानी इस्लामिक क्रांति के बाद, सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की सत्ता के लिए पहली बड़ी चुनौती मान रहे हैं। ईरान में हर रात सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ रही है। दुनिया भर के नेता सोच रहे हैं कि इस्लामिक गणराज्य में अब सत्ता पलट सकती है। यह ऐतिहासिक घटना होगी, जो वैश्विक राजनीति और तेल बाजार को बदल देगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में ईरान में इस्लामिक शासन बदल जाएगा, अगर हां, तो उसकी जगह कौन ले सकता है?
क्या ईरान की सत्ता गिर जाएगी?
'द अटलांटिक' में छपे एक लेख का कहना है कि 1979 के बाद पहली बार ईरान में क्रांति की लगभग सारी ऐतिहासिक परिस्थितियां बन गई हैं। इसमें कई कारण हैं, जैसे भयंकर आर्थिक संकट। ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह डूब रही है। हाइपरइन्फ्लेशन, डॉलर के मुकाबले ईरानी रियाल का बुरी तरह से गिरना, सरकारी खजाना खाली और तेल की कमाई गायब होने से हर वर्ग का जीवनस्तर गिर गया।
इसके अलावा, एलीट वर्ग भी नाराज हो गया है। पुराने साथी और तकनीकी विशेषज्ञ हाशिए पर धकेल दिए गए। इससे सत्ता का आंतरिक समर्थन खत्म हो गया। विपक्ष भी एकजुट है। प्रदर्शन बाजार व्यापारियों, छात्रों से लेकर अल्पसंख्यकों तक फैल गए हैं।
तेहरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अलग-थलग पड़ गया है, क्योंकि सैन्य विफलताओं और प्रतिबंधों का सामना करने के बावजूद कुछ सहयोगी देशों ने उसका साथ छोड़ दिया है। इस वजह से उसकी शक्ति प्रदर्शन की क्षमता भी कमजोर हो गई है।
अब सरकार के खिलाफ एक नया नैरेटिव भी चल रहा है, जो सरकार की धार्मिक शासन की विचारधारा के बजाय राष्ट्रवादी हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
लेकिन अभी भी कुछ कामी बाकी है। सुरक्षा बल, खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC), एकजुट हैं और खुलेआम सरकार के साथ। यही सत्ता को बचाए हुए है। लेख में यह तर्क दिया गया है कि एक सफल क्रांति के लिए जमीनी स्तर पर जनता का पूरी तरह आना और एलीट वर्ग का दल-बदल दोनों की जरूरत होगी, जो कि अभी नहीं हुआ है।
कौन संभाल सकता है ईरान की सत्ता?
रजा पहलवी
ऐसी पूरी संभावना है कि ईरान के पूर्व शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे रजा पहलवी सत्ता संभाल सकते हैं। मोहम्मद पहलवी 1941 से 1979 तक शासन करने वाले ईरान के पूर्व शाह थे।
65 साल के रजा पहलवी 1979 की क्रांति के दौरान अपने पिता के ईरान से भागने से एक साल पहले से ही अमेरिका में हैं। वे ईरानी प्रवासी समुदायों और अमेरिकी अधिकारियों के साथ संबंध कायम करने पर पूरा फोकस कर रहे हैं। पहलवी के कुछ करीबी लोगों का दावा है कि वे मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ईरान की स्थापना करना चाहते हैं।
पहलवी ने 8 जनवरी को ईरानियों से अपने घरों से निकल कर सड़कों पर आ कर रात 8 बजे नारे लगाने की अपील की थी। उनके सहयोगियों ने दावा किया है कि तेहरान, मशहद, इस्फहान, अहवाज और तबरीज सहित कई शहरों में बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए। उनके विरोध प्रदर्शन के आह्वान को इंस्टाग्राम पर लाखों लाइक और करोड़ों व्यूज मिले।
CIA के पूर्व ईरान डेस्क अधिकारी रूएल मार्क गेरेच्ट ने वाशिंगटन पोस्ट को बताया, “पहलावी एक जटिल व्यक्तित्व हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के भीतर उनके कुछ समर्थक हैं और इस्लामी गणराज्य में उनके प्रति पुरानी यादें ताजा हो गई हैं।” उन्होंने आगे कहा, “जैसे-जैसे इस्लामी गणराज्य का आकर्षण कम होता गया है, वैसे-वैसे पहलवी का कद बढ़ा है, बल्कि आसमान छू गया है।”
पहलवी ने खुद कहा है कि वह संक्रमणकालीन नेता की भूमिका निभाएंगे, यानी वो नेता जो सत्ता बदलते समय अस्थायी रूप से देश को संभालता है। वह लोकतंत्र की ओर रास्ता तैयार करता है। रजा पहलवी ने खुद कहा है कि वह इसी भूमिका में काम करेंगे।
एक अखबार में उनके लेख में उन्होंने खुद को आगे बढ़ाया। उन्होंने लिखा, "मैं लोकतंत्र की ओर देश की नई सत्ता व्यवस्था का प्रबंधक बनने को तैयार हूं। न कि भावी शासक।"
उन्होंने लिखा, "ईरान लोकतंत्र के लिए तैयार है। जिम्मेदार और अच्छी तैयारी वाला बदलाव हो सकता है। मैं सत्ता नहीं चाहता। बल्कि ईरान के लोकतांत्रिक बलों को एकजुट करना और शांतिपूर्ण बदलाव लाना चाहता हूं।"
उन्होंने जोर दिया कि वह राजशाही वापस नहीं लाना चाहते। उन्होंने कहा, "मेरा काम न तो राजशाही के पक्ष में झुकना है, न गणराज्य के। मैं पूरी तरह निष्पक्ष रहूंगा। ताकि ईरान के लोग आजाद होकर अपना चुनाव कर सकें।"
कुछ प्रदर्शनकारी राजशाही वापसी चाहते हैं। लेकिन अगर सत्ता गिरी, तो क्या रजा को जमीन पर समर्थन मिलेगा, यह देखना बाकी है।
हसन रूहानी या राजनयिक
ईरान के पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी एक बार फिर अहम दावेदारों में गिने जा रहे हैं। रूहानी 2013 से 2021 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे और पश्चिमी देशों से बातचीत के लिए जाने जाते हैं। साल 2013 में वह अमेरिका के राष्ट्रपति से सीधे बातचीत करने वाले पहले ईरानी नेता बने थे। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की सरकार रूहानी पर करीबी नजर बनाए हुए है।
ईरान के जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता अली रजा नूरीजादेह के मुताबिक, सरकार उनकी फोन कॉल सुन रही है और उनकी गतिविधियों पर नजर रख रही है। अधिकारियों को शक है कि अमेरिका ईरान के अंदर मौजूद लोगों से संपर्क में है।
एक और संभावित नाम ईरानी राजनयिक सैयद हुसैन मुसावियन का है। वह 1990 से 1997 तक जर्मनी में ईरान के राजदूत रह चुके हैं। इसके अलावा, वह यूरोप के साथ ईरान की परमाणु वार्ता टीम के प्रवक्ता भी रहे हैं।
फिलहाल मुसावियन अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में वेस्ट एशिया की सुरक्षा और परमाणु नीति पर काम कर रहे हैं। उन्हें परमाणु कूटनीति, ईरान-अमेरिका संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा का विशेषज्ञ माना जाता है।
ब्रिटेन के एक रिसर्च सेंटर के विशेषज्ञ एंड्रयू एपोस्टोलू का कहना है कि मुसावियन पूर्व राष्ट्रपति रफसंजानी के करीबी लोगों में से हैं और राजनीतिक हालात में खुद को बचाए रखने की अच्छी समझ रखते हैं।
विपक्षी नेता मरियम रजवी
इस बीच, अमेरिका के कुछ बड़े नेताओं जैसे पूर्व उपराष्ट्रपति माइक पेंस, पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रुडी जूलियानी ने ईरान के विपक्षी संगठन मुजाहिदीन-ए-खल्क का समर्थन किया है। इस संगठन की नेता मरियम रजवी हैं।
मरियम रजवी का कहना है कि ईरान में बदलाव बाहर से नहीं आएगा और न ही किसी विदेशी देश की इच्छा से होगा। उनके अनुसार, जब सत्ता बदलेगी तो सारी ताकत एक जनसभा को सौंप दी जाएगी, जो अस्थायी सरकार बनाएगी और नए गणराज्य का संविधान तैयार करेगी।
रजवी ने यह भी कहा कि उनके संगठन ने लैंगिक समानता, धर्म और सरकार को अलग रखने, ईरानी कुर्दिस्तान को स्वायत्तता देने जैसे कई अहम मुद्दों को पहले ही मंजूरी दे दी है।
आखिरी रास्ता- सेना
कुछ लोगों का मानना है कि हालात काबू में आने के बाद देश की सुरक्षा एजेंसियां ही सत्ता संभाल सकती हैं। उनका कहना है कि इसकी वजह यह है कि फिलहाल कोई साफ तौर पर सामने आने वाला नेता मौजूद नहीं है।
इजरायल के इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज से जुड़े ईरान विशेषज्ञ बेनी साबती का कहना है कि सेना के नेतृत्व में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि IRGC (ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड) के जनरल सैद्धांतिक रूप से तख्तापलट की कोशिश कर सकते हैं। उनके मुताबिक, ईरान में नेतृत्व के लिए करिश्मा बहुत अहम होता है और यही सबसे बड़ी कमी है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं दिखता।
ईरान के जानकार और नादर रिसर्च ग्रुप के अध्यक्ष अलीरेजा नादर के अनुसार, सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं है। असली सवाल यह है कि कौन सी ताकतें सड़कों पर नियंत्रण कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि आखिर में जमीन पर मौजूद ताकतें ही फैसला करेंगी।
नादर ने यह भी कहा कि जब तक मौजूदा शासन एकजुट रहेगा, हालात बदलने से पहले बड़ी संख्या में लोगों की जान जा सकती है।
वहीं कुछ लोगों ने पश्चिमी देशों को ईरान के मामले में सावधानी बरतने की सलाह दी है।
फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के वरिष्ठ विशेषज्ञ बेहनाम बेन तालब्लू ने चेतावनी दी कि पश्चिम को ऐसे दिखावटी सत्ता परिवर्तन का समर्थन नहीं करना चाहिए, जिसमें सुरक्षा बलों का ही नियंत्रण बना रहे।
उन्होंने कहा कि उन्हें डर है कि कहीं पश्चिम मिस्र या वेनेजुएला जैसे मॉडल को अपनाने की गलती न कर बैठे, जहां ऊपर-ऊपर बदलाव होता है लेकिन आम लोगों को असली फायदा नहीं मिलता।
बेनी साबती ने भी कहा कि फिलहाल ऐसा समय नहीं आया है। उनके मुताबिक, ईरान में अब भी सर्वोच्च नेता खामेनेई मौजूद हैं और सुरक्षा बल एकजुट हैं, इसलिए तुरंत बदलाव की संभावना कम है।