Iran War: ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी युद्ध अब खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ा खतरा बन गया है। ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह संघर्ष अप्रैल तक खिंचता है, तो कतर और कुवैत जैसे देशों को 1990 के दशक के 'खाड़ी युद्ध' के बाद की सबसे भयानक आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
कतर और कुवैत की जीडीपी में 14% तक गिरावट संभव
गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री फारूक सूसा के अनुसार, ऊर्जा निर्यात पर अत्यधिक निर्भरता इन देशों के लिए मुसीबत बन सकती है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला यातायात दो महीने के लिए भी पूरी तरह बाधित रहता है, तो कतर और कुवैत की GDP में 14% तक की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट 1990 के दशक के बाद की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी होगी, जब इराक द्वारा कुवैत पर आक्रमण के कारण तेल बाजार में उथल-पुथल मची थी।
सऊदी और यूएई की स्थिति थोड़ी बेहतर
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पर भी युद्ध की मार पड़ेगी, लेकिन वे कुछ अन्य देशों की तुलना में सुरक्षित हैं। इन दोनों देशों के पास होर्मुज के रास्ते को बायपास करने वाले वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग हैं, जिससे वे अपना तेल निर्यात जारी रख सकते हैं। अनुमान है कि सऊदी अरब की जीडीपी में 3% और यूएई की अर्थव्यवस्था में 5% की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट 2020 के कोविड-19 संकट से भी बड़ी हो सकती है।
कच्चे तेल की कीमत $103 के पार, एनर्जी मार्केट में हाहाकार
युद्ध के कारण वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिली है और 103 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। कतर की लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का निर्यात शिपिंग रुकने के कारण काफी गिर गया है। बहरीन ने दुनिया के सबसे बड़े एल्युमीनियम स्मेल्टर में उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है क्योंकि सप्लाई चेन बाधित हो गई है।
पर्यटन और निवेश पर भी बड़ी चोट
यह युद्ध केवल तेल तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता के कारण अन्य क्षेत्रों को भी नुकसान हो रहा है। युद्ध के कारण पर्यटकों की संख्या कम हो गई है और विदेशी निवेश में भी गिरावट देखी जा रही है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि युद्ध के जख्म भरने में समय लगेगा और इससे निवेशकों के आत्मविश्वास पर जो असर पड़ेगा, वह लंबे समय तक बना रह सकता है।
युद्ध का सऊदी अरब पर नहीं पड़ेगा कुछ खास असर!
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस पूरे संकट में सऊदी अरब सबसे अधिक लचीला साबित हो सकता है। सऊदी अरब अब तक ईरान के अधिकांश हमलों को रोकने में सफल रहा है और वहां का हवाई क्षेत्र व व्यापारिक गतिविधियां काफी हद तक सामान्य रूप से चल रही हैं। हालांकि शॉर्ट-टर्म में सऊदी अरब का वित्तीय घाटा बढ़ सकता है, लेकिन अगर तेल की कीमतें 90 डॉलर के आसपास रहती हैं, तो पूरे साल का घाटा अनुमान से कम हो सकता है।