US-Iran Talks: मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच कूटनीति की मेज पर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत विफल होने के बाद, अब खबर है कि अमेरिका और ईरान 16 अप्रैल को फिर से आमने-सामने बैठ सकते हैं। 21 अप्रैल को खत्म हो रहे 'सीजफायर' से पहले यह बातचीत दुनिया को युद्ध के मुहाने से वापस लाने की आखिरी कोशिश मानी जा रही है।
वेन्यू को लेकर सस्पेंस बरकरार
अगली बैठक कहां होगी, इसे लेकर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है। इस्लामाबाद दूसरे दौर की मेजबानी के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। पहले दौर की 21 घंटे लंबी बातचीत यहीं हुई थी। वैसे रिपोर्ट्स के अनुसार, तटस्थता बनाए रखने के लिए स्विट्जरलैंड के जिनेवा को एक वैकल्पिक वेन्यू के रूप में देखा जा रहा है। कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जगह का चुनाव ही दोनों देशों की 'गंभीरता' का संकेत देगा।
बातचीत की मेज पर क्या है?
बातचीत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा परमाणु कार्यक्रम और पाबंदियां हैं। वाशिंगटन ने प्रस्ताव रखा है कि ईरान पर यूरेनियम संवर्धन के लिए 20 साल का कड़ा प्रतिबंध लगाया जाए। वहीं तेहरान केवल 5 साल की रोक पर विचार करने को तैयार है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन तभी जब तेहरान उनकी शर्तों को पूरी तरह स्वीकार करे। उन्होंने हाल ही में 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की नाकेबंदी कर दबाव और बढ़ा दिया है।
युद्ध से हुआ $270 अरब का नुकसान
ईरान ने अनुमान लगाया है कि अब तक की सैन्य गतिविधियों और युद्ध की स्थिति के कारण उसे लगभग 270 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। वहीं, भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथली ने नई दिल्ली में कहा कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अगर कूटनीति फेल होती है, तो वे 'युद्ध सहित सभी विकल्पों' के लिए तैयार हैं।
ग्लोबल मार्केट में आई हरियाली
जैसे ही शांति वार्ता की खबर आई, दुनिया भर के बाजारों में 'ऑक्सीजन' लौट आई। जापान का Nikkei 225 ढाई फीसदी बढ़ा, जबकि दक्षिण कोरिया का KOSPI करीब 3.7% चढ़ गया। भारत और हांगकांग के बाजारों में भी सकारात्मक रुख देखा गया।तनाव कम होने की उम्मीद में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 1.5% गिरकर $98 प्रति बैरल के नीचे आ गईं। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत है।
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने पोप पर हमले को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना की है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बदलती केमिस्ट्री को दर्शाता है। वहीं सऊदी अरब भी अमेरिका पर दबाव बना रहा है कि वह होर्मुज की नाकेबंदी पर दोबारा सोचे, क्योंकि इससे ईरान का खतरा अब 'रेड सी' की ओर शिफ्ट हो सकता है।