Nepal's Balen Shah Govt: जब से नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह बने है तभी से उनकी सरकार सुर्खियों में है। सुर्खियों में बने रहने की वजह है रोज लिए जा रहे नए-नए फैसले। नया मामला काठमांडू घाटी में चल रहे 'बुलडोजर एक्शन' को लेकर है जहां सरकार गंभीर विवादों में घिर गई है। सोमवार को नेपाल के 28 प्रमुख नागरिकों ने एक संयुक्त बयान जारी कर सरकार पर लोकतांत्रिक मानदंडों को कमजोर करने और तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया है।
2,000 से अधिक अवैध निर्माणों पर चला बुलडोजर
बालेन सरकार ने पिछले कुछ दिनों में काठमांडू घाटी के नदी तटों पर बने 2,000 से अधिक अवैध ढांचों को ध्वस्त कर दिया है। सरकार का तर्क है कि ये निर्माण अवैध हैं, लेकिन विपक्ष और नागरिक समाज इस कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठा रहे हैं।
प्रमुख नागरिकों ने सरकार को घेरा
नेपाल के पूर्व मंत्रियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ पत्रकारों सहित 28 दिग्गजों ने सरकार की आलोचना की है। नागरिकों का आरोप है कि बिना किसी पुनर्वास योजना या पहचान के लोगों को जबरन बेदखल किया जा रहा है। विरोध पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व मंत्री नीलांबर आचार्य, मानवाधिकार कार्यकर्ता सुशील प्याकुरेल, वरिष्ठ पत्रकार कनक मणि दीक्षित, वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी और नारायण वाग्ले जैसे बड़े नाम शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इस बेदखली अभियान के कारण अब तक दो लोग आत्महत्या कर चुके हैं। हजारों लोग, जिनमें गर्भवती महिलाएं और बच्चे शामिल हैं जो बिना आश्रय, स्वास्थ्य सेवा और पढ़ाई के रह रहे हैं। स्थानीय निवासियों के खिलाफ सशस्त्र सुरक्षा बलों और राष्ट्रीय सेना का उपयोग करने को असंवैधानिक और अमानवीय बताया गया है।
मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस (NC) ने सरकार के इस कदम को 'क्रूर' और 'अमानवीय' करार दिया है। पार्टी का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना भूमिहीन बसने वालों को हटाना गलत है। स्कूलों, मंदिरों और मठों को ढहाने की घटनाओं पर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई है।
लोकतंत्र और प्रेस की आजादी पर खतरा
बयान में सरकार द्वारा विधायी बहस के बजाय अध्यादेशों र निर्भरता बढ़ाने की भी आलोचना की गई है। आरोप है कि, संसद सत्र को स्थगित कर अध्यादेश लाना लोकतांत्रिक शासन के खिलाफ है। रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को रोका गया और उनसे जबरन फोटो व वीडियो डिलीट करवाए गए, जो प्रेस की आजादी पर हमला है। छात्र संघों और ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने की कथित योजना को भी असंवैधानिक बताया गया है।