नेपाल के GenZ प्रोटेस्ट पर आई ये रिपोर्ट हिला देगी, 'AI, ह्यूमन शील्ड, फेक पुलिस पेज' और क्या-क्या किया गया?

Nepal News: पड़ोसी देश नेपाल में 8 और 9 सितंबर 2025 को युवाओं के बड़े GenZ प्रदर्शन हुए थे। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे। लेकिन बाद में हिंसा भड़क गई। इस दौरान संसद भवन, सिंहदरबार, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति भवन जैसी सरकारी इमारतों में आगजनी और तोड़फोड़ हुई। अब इस पर एक चौंकाने वाला रिपोर्ट सामने आया है

अपडेटेड May 28, 2026 पर 1:04 PM
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Nepal News: नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) की Gen Z प्रोटेस्ट रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है

Nepal News: नेपाल में सितंबर 2025 में हुए बड़े युवा प्रदर्शनों और हिंसा को लेकर नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) ने करीब 1,000 पन्नों की जांच रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में उस समय के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, गृह मंत्री रमेश लेखक और सूचना मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरूंग को मानवाधिकार उल्लंघन का जिम्मेदार बताया गया है। जांच में कहा गया कि सरकार ने प्रदर्शन रोकने के लिए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया, जिससे कई लोगों की मौत और चोटें हुईं। रिपोर्ट में इन नेताओं पर कार्रवाई और नया कानून बनाने की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पुलिस और सुरक्षाबलों के पास सही सुरक्षा उपकरण नहीं थे, जिससे हालात और बिगड़ गए। इसके अलावा, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता रवि लामिछाने और कई सांसदों की भूमिका की भी जांच की सिफारिश की गई है। उन पर प्रदर्शन के दौरान लोगों को भड़काने और जेल से कैदियों को बाहर निकलने में मदद करने के आरोप हैं।

NHRC ने नेपाल पुलिस, Armed Police Force और सेना के कुछ अधिकारियों पर भी कार्रवाई की सिफारिश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, सेना सरकारी इमारतों को नुकसान से बचाने में नाकाम रही। नेपाल में 8 और 9 सितंबर 2025 को युवाओं के बड़े प्रदर्शन हुए थे। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे। लेकिन बाद में हिंसा फैल गई। इस दौरान संसद भवन, सिंहदरबार, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति भवन जैसी सरकारी इमारतों में आगजनी और तोड़फोड़ हुई।


रिपोर्ट में क्या है?

GenZ प्रोटेस्ट के करीब 9 महीने बाद नेपाल के नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) ने अपनी जांच रिपोर्ट जारी की है। यह जांच डॉ. लिली थापा की अगुवाई में हुई। जांच टीम ने करीब छह महीने तक सबूत जुटाए। इस दौरान लोगों के बयान लिए। सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो देखे। फिर करीब 1,000 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की। NHRC का कहना है कि प्रदर्शन रोकने के लिए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया, जिससे लोगों की मौतें और कई लोग घायल हुए।

रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा सरकार के मुखिया होने के कारण पूरे एक्शन के लिए जिम्मेदार थे। वहीं, गृह मंत्री रमेश लेखक पर पुलिस और सुरक्षा बलों को सही तरीके से कंट्रोल न करने का आरोप लगा। सूचना मंत्री गुरूंग पर सोशल मीडिया बैन और अपने बयानों से माहौल बिगाड़ने का आरोप है।

नया कानून बनाकर कार्रवाई करने की सिफारिश

NHRC ने इन नेताओं के खिलाफ नया कानून बनाकर कार्रवाई करने की सिफारिश की है। साथ ही चुनाव लड़ने और विदेश यात्रा पर भी रोक लगाने की बात कही गई है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के नेता रवि लामिछाने का भी जिक्र है। उस समय वह जेल में थे। लेकिन प्रदर्शन के दौरान जेल से बाहर निकलने और दूसरे कैदियों को बाहर निकलवाने में उनकी भूमिका की जांच की सिफारिश की गई है।

इसके अलावा RSP के 17 सांसदों और कई नेताओं के खिलाफ भी जांच की सिफारिश हुई है। आरोप है कि उनके बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट से प्रदर्शनकारी भड़के। नेपाल पुलिस, Armed Police Force और सेना के कई अधिकारियों पर भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण नहीं थे। साथ ही सेना सरकारी इमारतों को नुकसान से बचाने में नाकाम रही।

NHRC का कहना है कि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण नहीं थे। कई प्रदर्शनकारी डंडे, गुलेल और हथियार जैसी चीजें लेकर पहुंचे थे। पुलिस पर हमला भी किया गया। इसी वजह से हालात तेजी से हिंसक बन गए। यह रिपोर्ट उसी दिन (27 मई) प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को औपचारिक रूप से सौंपी गई, जिस दिन इसे सार्वजनिक किया गया था।

तीन प्रमुख लोगों का जिक्र

'नेपाल न्यूज' के मुताबिक, NHRC ने किन तीन मुख्य लोगों को मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया है। रिपोर्ट में सीधे तौर पर उन तीन लोगों के नाम लिए गए हैं, जो विरोध प्रदर्शनों के दौरान सरकारी नेतृत्व के पदों पर थे। इनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली, तत्कालीन गृह मंत्री रमेश लेखक और तत्कालीन सूचना और संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग का नाम शामिल है। NHRC की पूरी पीठ ने औपचारिक रूप से पुष्टि की है कि इन तीनों ने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है। चूंकि नेपाल में मौजूदा कोई भी कानून इस तरह के मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए खास तौर पर सज़ा नहीं देता है।

इसलिए आयोग ने सरकार से एक नया कानून बनाने और उसका इस्तेमाल करके इन तीनों लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए कहा है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए एक मिसाल का हवाला दिया, जो मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में पिछली तारीख से लागू होने वाले कानूनों को लागू करने की अनुमति देता है। इसका मतलब है कि आज पारित कानून का इस्तेमाल अतीत में किए गए कामों को सज़ा देने के लिए किया जा सकता है।

केपी ओली ने आखिर ऐसा क्या किया, जिसे NHRC उल्लंघन मानता है?

विरोध प्रदर्शनों के दौरान सरकार के मुखिया के तौर पर ओली पर यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी कि राज्य की सुरक्षा बलों को कैसे तैनात किया जाए और उन्हें क्या आदेश दिए जाएं। NHRC की रिपोर्ट में ओली को उस कमांड चेन के सबसे ऊपर रखा गया है, जिसने प्रदर्शनकारियों पर सख्ती करने का निर्देश दिया था। रिपोर्ट में शांतिपूर्ण समाधान निकालने में उनकी नाकामी, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जानलेवा हथियारों का इस्तेमाल करने का फैसला और वह व्यापक कार्रवाई जिसके चलते लोगों की मौतें हुईं और वे घायल हुए इन सभी के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया गया है।

आयोग ने सिफारिश की है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों को सजा देने के लिए जो भी नया कानून बनाया जाए, उसे सबसे पहले ओली पर ही लागू किया जाना चाहिए। आयोग का यह भी मानना ​​है कि ओली उन लोगों में शामिल हैं, जिन पर पांच साल तक कोई भी चुनाव लड़ने और तीन साल तक विदेश यात्रा करने पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए।

गृह मंत्री पर क्या है आरोप?

रमेश लेखक नेपाल में विरोध प्रदर्शनों के दौरान गृह मंत्री थे। उनके पास नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल और राष्ट्रीय जांच विभाग की सीधी प्रशासनिक देखरेख की जिम्मेदारी थी। NHRC ने उन्हें इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया है कि दोनों ही दिन सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों के साथ किस तरह का बर्ताव किया।

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आंतरिक सुरक्षा के प्रभारी मंत्री होने के नाते, वह इस स्थिति में थे कि वे बल के उचित इस्तेमाल के बारे में साफ-साफ गाइडलाइंस जारी कर सकें, तैनात कर्मियों के लिए सुरक्षा उपकरण सुनिश्चित कर सकें और जवाबदेही की एक व्यवस्था स्थापित कर सकें। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि गृह मंत्री अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभाई।

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