पाकिस्तान में 331 मासूमों को हुआ HIV, एक ही सीरिंज से कई बच्चों को लगाया इंजेक्शन! सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं बंट रही मौत

Pakistan News: मोहम्मद अमीन सिर्फ आठ साल का था, जब उसकी मौत हुई। मरने से पहले वह HIV पॉजिटिव पाया गया था। उसकी मां सुघरा बताती हैं कि अमीन को इतना तेज बुखार रहता था कि वह बारिश में सोने की जिद करता था। वह दर्द से ऐसे तड़पता था, जैसे किसी ने उसे 'खौलते तेल' में डाल दिया हो

अपडेटेड Apr 14, 2026 पर 3:35 PM
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पाकिस्तान में 331 मासूमों को हुआ HIV, एक ही सीरिंज से बच्चों को लगाया इंजेक्शन (FILE PHOTO)

दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाने का ढोंग रचने वाले पाकिस्तान के भीतर किस हद की लापरवही हुई, यह जान कर ही आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे। एक तरफ हमारे पड़ोसी देश की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान की बीच हाई लेवल की बातचीत चल रही है, लेकिन वहां से महज करीब 400 Km दूर एक सरकारी अस्पताल की गलती की वजह से 331 मासूम HIV पॉजिटिव हो गए। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के तौंसा (Taunsa) शहर से यह रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर सामने आई है। यहां के एक सरकारी अस्पताल की लापरवाही ने सैकड़ों बच्चों की जिंदगी नर्क बना दी है। BBC की एक गुप्त जांच में खुलासा हुआ है कि अस्पताल का स्टाफ इस्तेमाल की हुई सुइयां दोबारा इस्तेमाल कर बच्चों के खून में जहर घोल रहा है।

एक मासूम की मौत और बिलखता परिवार

मोहम्मद अमीन सिर्फ आठ साल का था, जब उसकी मौत हुई। मरने से पहले वह HIV पॉजिटिव पाया गया था। उसकी मां सुघरा बताती हैं कि अमीन को इतना तेज बुखार रहता था कि वह बारिश में सोने की जिद करता था। वह दर्द से ऐसे तड़पता था, जैसे किसी ने उसे 'खौलते तेल' में डाल दिया हो।


दुख की बात यह है कि अमीन की 10 साल की बहन, अस्मा भी अब HIV पॉजिटिव है। अस्मा अपने भाई की कब्र पर घुटनों के बल बैठकर कहती है, "वह मुझसे लड़ता था, पर प्यार भी बहुत करता था।" परिवार का मानना है कि इन दोनों मासूमों को तौंसा के सरकारी अस्पताल (THQ) में इलाज के दौरान संक्रमित सुइयों से यह बीमारी मिली।

32 घंटे का अंडरकवर ऑपरेशन: कैमरे में कैद हुई 'हैवानियत'

जब अस्पताल प्रशासन ने दावों को नकारा, तो BBC Eye ने तौंसा अस्पताल में 32 घंटों तक गुप्त रूप से एक स्टिंग ऑपरेशन किया। जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी के भी होश उड़ा सकती हैं:

सीरिंज का दोबारा इस्तेमाल: स्टाफ को 10 अलग-अलग मौकों पर एक ही सीरिंज से कई बच्चों को दवा देते देखा गया।

बिना दस्ताने इलाज: दीवारों पर सुरक्षित इलाज के पोस्टर लगे होने के बावजूद, डॉक्टर और नर्सों को 66 बार बिना स्टेरिल दस्तानों के इंजेक्शन लगाते पकड़ा गया।

खतरनाक लापरवाही: एक नर्स को बिना दस्तानों के मेडिकल कचरे के डिब्बे में हाथ डालते और फिर वही हाथ मरीजों पर इस्तेमाल करते देखा गया।

खुली सुइयां: काउंटर पर इस्तेमाल की हुई सुइयां और दवा की बोतलें खुले में पड़ी मिलीं, जो संक्रमण फैलाने का सीधा जरिया हैं।

रिपोर्ट में माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. अल्ताफ अहमद कहते हैं, "अगर वे सुई बदल भी दें, तो सीरिंज का पिछला हिस्सा (Syringe Body) वायरस से भरा होता है। नई सुई लगाने से भी वायरस दूसरे शरीर में चला जाता है।"

सरकारी तंत्र का शर्मनाक चेहरा: कार्रवाई सिर्फ कागजों पर?

नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच इस छोटे से शहर में 331 बच्चे HIV पॉजिटिव पाए गए हैं।

मार्च 2025 में जब मामला बढ़ा, तो तत्कालीन एमएस डॉ. तैयब को सस्पेंड किया गया। लेकिन जांच में पता चला कि महज तीन महीने बाद वे पास के ही एक केंद्र में फिर से बच्चों का इलाज कर रहे थे।

नए एमएस डॉ. कासिम बुजदार ने अंडरकवर फुटेज देखने के बाद उसे 'फर्जी' या 'मनगढ़ंत' करार दे दिया और दावा किया कि उनका अस्पताल सुरक्षित है।

यह मामला अकेला नहीं है। 2019 में सिंध के रतोदेरो में सैकड़ों बच्चे HIV से संक्रमित हुए थे। 2021 तक यह संख्या 1500 तक पहुंच गई। हाल ही में कराची में भी इसी तरह के मामले सामने आए थे, यानी यह एक बड़े सिस्टम फेलियर की ओर इशारा करता है।

आखिर क्यों सुइयां दोबारा इस्तेमाल हो रही हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे दो बड़े कारण हैं:

सिस्टम का दबाव और कमी: अस्पतालों को बजट और सामान का एक निश्चित 'कोटा' दिया जाता है। महीने भर सामान चलाने के चक्कर में स्टाफ 'शॉर्टकट' अपनाता है, जो जानलेवा साबित होता है।

इंजेक्शन का कल्चर: पाकिस्तान में छोटी-छोटी बीमारी के लिए भी इंजेक्शन लगवाने का चलन सा है। डॉ. फातिमा मीर कहती हैं, "हमने अपने इंजेक्शन लगाने वालों को ही बीमारी फैलाने वाला हथियार बना दिया है।"

अस्मा का अधूरा सपना

अस्मा का वजन लगातार गिर रहा है। पड़ोसी अब उसके साथ अपने बच्चों को खेलने नहीं देते। वह अपनी मां से पूछती है, "मुझे क्या हुआ है?" उसे नहीं पता कि उसे वह बीमारी दी गई है, जिसका कोई इलाज नहीं है।

इतने दर्द के बावजूद अस्मा स्कूल जाती है और कड़ी मेहनत करती है। जब उससे पूछा गया कि वह बड़ी होकर क्या बनना चाहती है, तो उसने बड़े गर्व से कहा- "मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं।"

यह मामला सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक चेतावनी है। अगर बुनियादी सफाई और 'इंफेक्शन कंट्रोल' पर ध्यान नहीं दिया गया, तो अस्पताल जीवन देने के बजाय मौत बांटने वाले केंद्र बन जाएंगे। जरूरत है कि स्वास्थ्य बजट को सिर्फ इमारतों पर नहीं, बल्कि सुरक्षित उपकरणों और स्टाफ की ट्रेनिंग पर खर्च किया जाए।

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