US-Iran Mediation Talks: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण युद्ध को रोकने के लिए कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। रविवार यानी आज से पाकिस्तान एक बेहद महत्वपूर्ण उच्च-स्तरीय बैठक की मेजबानी करने रहा है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के दिग्गज राजनयिक शामिल होंगे। इस दो दिवसीय बैठक का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता साफ करना और क्षेत्र में तनाव कम करना है।
बीते दिन पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से एक घंटे से ज्यादा फोन पर बात की। ईरान ने पाकिस्तान की इस मध्यस्थता की कोशिशों का स्वागत किया है।
इस्लामाबाद में 'चार देशों' का महामंथन
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस बैठक में चार मुस्लिम देशों के विदेश मंत्री पाकिस्तान के इशाक डार, तुर्की के हकन फिदान और सऊदी अरब व मिस्र के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। तुर्की के विदेश मंत्री के मुताबिक, यह बैठक युद्ध की दिशा तय करने और तनाव कम करने के लिए एक 'मैकेनिज्म' तैयार करने पर केंद्रित है। इसके साथ ही जर्मन विदेश मंत्री के हवाले से खबर है कि अमेरिका और ईरान के बीच सीधी मुलाकात 'बहुत जल्द' पाकिस्तान में हो सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने अमेरिका का एक शांति प्रस्ताव तेहरान तक पहुंचाया है। अमेरिका ने युद्ध खत्म करने के लिए 15 शर्तें रखी हैं, जिनमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल विकास और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े नियम शामिल हैं। ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव को 'एकतरफा' बताया है और अपना खुद का 5-सूत्रीय फ्रेमवर्क पेश किया है, जिसमें संप्रभुता और नुकसान की भरपाई की मांग की गई है।
तनाव के बीच 'कॉन्फिडेंस बिल्डिंग' उपाय
कूटनीतिक बातचीत को सफल बनाने के लिए कुछ सकारात्मक कदम भी उठाए गए हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बताया कि ईरान ने पाकिस्तानी झंडे वाले 20 अतिरिक्त जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी है। इसे भरोसे की बहाली की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने वाशिंगटन की 'अनुचित मांगों' पर संदेह जताया है।
कूटनीति के साथ-साथ युद्ध के मोर्चे पर भी जारी है तैयारी
एक तरफ शांति की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ सैन्य तैनाती कम नहीं हुई है। अमेरिका ने क्षेत्र में करीब 3,500 मरीन और 82nd एयरबोर्न डिवीजन के 5000 पैराट्रूपर्स तैनात किए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का मानना है कि अमेरिका बिना जमीनी सेना उतारे भी अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है।