Pakistan: स्विट्जरलैंड के दावोस में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात होने वाली है। इस मुलाकात का केंद्र ट्रंप का महत्वाकांक्षी 'गाजा शांति प्लान' है। आर्थिक कंगाली और घरेलू अशांति से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह ट्रंप के करीब आने और कर्ज से राहत पाने का एक आखिरी मौका माना जा रहा है।
ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' क्या है?
राष्ट्रपति ट्रंप ने गाजा में युद्ध के बाद की स्थिति को संभालने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय निकाय बनाया है जिसे 'बोर्ड ऑफ पीस' नाम दिया गया है। इसमें मार्को रुबियो, टोनी ब्लेयर, और जारेड कुशनर जैसे नाम शामिल हैं। ट्रंप ने पाकिस्तान को इस बोर्ड के 'फाउंडिंग मेंबर' के रूप में आमंत्रित किया है। पाकिस्तान ने इस पर अपनी शुरुआती सहमति दे दी है। पाकिस्तान की सेना को गाजा में प्रस्तावित 'इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स' का हिस्सा बनाने पर चर्चा चल रही है।
पाकिस्तान के सामने 'धर्मसंकट' वाली स्थिति
भले ही शहबाज सरकार इसे 'शांति मिशन' कह रही हो, लेकिन पाकिस्तान के भीतर इसका भारी विरोध हो रहा है। पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देता। ऐसे में इजरायली सेना के साथ तालमेल बिठाकर गाजा में काम करना एक बड़ी कानूनी और वैचारिक बाधा है। आलोचकों का कहना है कि सरकार ट्रंप की 'जी-हुजूरी' कर रही है ताकि सत्ता बची रहे और आईएमएफ (IMF) व अन्य देशों से पैसा मिलता रहे। क्या पाकिस्तानी सैनिक गाजा जैसे खतरनाक इलाके में तैनात होने के लिए तैयार हैं? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
'आर्थिक मजबूरी' या 'कूटनीतिक जीत'?
पाकिस्तान की उत्सुकता के पीछे असल वजह उसकी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था है। पाकिस्तान को यूएई (UAE) से $2.5 बिलियन के कर्ज को रोलओवर कराने की जरूरत है। ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच 'परमाणु युद्ध' होने से रोका था। अब पाकिस्तान इसी 'दोस्ती' का फायदा उठाकर आर्थिक पैकेज और सुरक्षा गारंटी चाहता है। पाकिस्तान खुद को कई मुस्लिम देशों के प्रतिनिधि के रूप में पेश कर इस बोर्ड में बड़ी लीडरशिप भूमिका चाहता है।
अगर यह डील सफल होती है, तो पाकिस्तान को वाशिंगटन से बड़ी आर्थिक मदद मिल सकती है। लेकिन अगर यह कदम उल्टा पड़ा, तो पाकिस्तान के भीतर नागरिक विद्रोह और बढ़ सकता है, क्योंकि जनता इसे फिलिस्तीन के मुद्दे पर 'सौदा' मान सकती है।