Strait of Hormuz: जब मिडिल ईस्ट में युद्ध की शुरुआत हुई और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप होने लगी, तब दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और बाजार एक्सपर्ट्स ने एक बेहद डरावनी भविष्यवाणी की थी।
Strait of Hormuz: जब मिडिल ईस्ट में युद्ध की शुरुआत हुई और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप होने लगी, तब दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और बाजार एक्सपर्ट्स ने एक बेहद डरावनी भविष्यवाणी की थी।
सबको लग रहा था कि कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई का एक नया तूफान आ जाएगा। इस डर की एक बड़ी वजह थी ये थी कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा अकेले इसी स्ट्रैट ऑफ होर्मुज रास्ते से होकर गुजरता है।
लेकिन उम्मीद के बिल्कुल उलट, एक बेहद हैरान करने वाली बात सामने आई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में इतनी बड़ी रुकावट के बावजूद कच्चे तेल की कीमतें उम्मीद से काफी नीचे बनी हुई हैं। हाल ही में ब्रेंट क्रूड $93 प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा था, जो कि युद्ध से पहले के स्तर से तो ज्यादा है, लेकिन विश्लेषकों द्वारा अनुमानित $150 प्रति बैरल के डरावने आंकड़े से बहुत कम है।
सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अब ऊर्जा बाजारों के सामने सबसे बड़ा रहस्य यही है कि आखिर यह 'लापता तेल' जा कहां रहा है और बाजार में इतनी शांति कैसे है? आइए इसके पीछे की 4 सबसे बड़ी वजहों को समझते हैं।
कागजों पर नाकेबंदी, लेकिन अंदरखाने चल रहे हैं 'घोस्ट शिप्स'
होर्मुज रास्ते पर जो ब्लॉकबस्टर नाकेबंदी दिख रही है, वह असल में उतनी सख्त नहीं है जितनी नजर आती है। एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि कई तेल टैंकर आधिकारिक डेटा और निगरानी से बचकर अब भी इस रास्ते से कच्चा तेल निकाल रहे हैं।
जहाज पकड़े जाने से बचने के लिए जानबूझकर अपना ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग सिस्टम बंद कर देते हैं, जिससे पारंपरिक शिपिंग डेटाबेस में इन्हें ट्रैक करना नामुमकिन हो जाता है।
बाजार के जानकार इन्हें 'घोस्ट' या गुप्त शिपमेंट कह रहे हैं। हालांकि यह सप्लाई युद्ध से पहले की तुलना में कम है, लेकिन फिर भी हर दिन लाखों बैरल तेल इस गुप्त रास्ते से ग्लोबल मार्केट में पहुंच रहा है, जिसने सप्लाई को पूरी तरह ठप होने से बचा रखा है।
2. सऊदी अरब का 'मास्टरस्ट्रोक' बना दूसरा बैकअप रूट
भौगोलिक नजरिए से देखें तो दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक सऊदी अरब, तेल बेचने के लिए पूरी तरह से सिर्फ होर्मुज रास्ते पर ही निर्भर नहीं है। सऊदी अरब के पास एक बेहद मजबूत वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।
संकट के इस दौर में सऊदी अरब ने अपने तेल उत्पादन के एक बड़े हिस्से को इस पाइपलाइन की तरफ डायवर्ट कर दिया है। यह पाइपलाइन पूरे देश को पार करते हुए कच्चे तेल को सीधे 'लाल सागर' के बंदरगाहों तक पहुंचा देती है।
हालांकि यह रूट अकेले स्ट्रैट ऑफ होर्मुज की पूरी कमी को तो नहीं भर सकता, लेकिन इसने वैश्विक बाजारों में तेल की भारी किल्लत होने से रोक दी है। अगर यह पाइपलाइन न होती, तो आज कच्चे तेल के दाम इतिहास के सबसे ऊंचे स्तर पर होते।
3. 'शॉक एब्जॉर्बर' बना चीन, अंतरराष्ट्रीय बाजार से फेरा मुंह
सप्लाई साइड के अलावा इस बार सबसे बड़ा सरप्राइज डिमांड यानी मांग की तरफ से आया है, जहां चीन ने एक सुरक्षा कवच की तरह काम किया है। दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं में से एक चीन ने पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार से नया कच्चा तेल खरीदना बेहद कम कर दिया है। इसके बजाय, बीजिंग अपने उस पुराने स्टॉक का इस्तेमाल कर रहा है, जिसे उसने संकट के समय के लिए पहले से जमा करके रखा था।
चीन के इस फैसले से ग्लोबल मार्केट पर नया तेल खरीदने का दबाव काफी कम हो गया है। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी तेल की मांग उम्मीद से थोड़ी कमजोर रही है, जिसने इस पूरे सप्लाई शॉक को काफी हद तक संभाल लिया है।
4. राहत तो है, लेकिन पर्दे के पीछे मंडरा रहा है बड़ा खतरा
बाजार भले ही अभी शांत दिख रहा हो, लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि यह शांति लंबे समय तक नहीं टिकने वाली। पर्दे के पीछे दुनिया भर के देशों के कमर्शियल और स्ट्रैटजिक तेल भंडार तेजी से खाली हो रहे हैं। बाजार को फिलहाल स्थायी समाधानों के बजाय केवल 'अस्थायी बंदोबस्त' के सहारे चलाया जा रहा है।
अगर यह युद्ध और लंबा खींचता है, तो एक दिन ये इमरजेंसी स्टॉक पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। उस स्थिति में तेल की कीमतों को जानबूझकर बहुत ऊपर ले जाना पड़ेगा, ताकि महंगी कीमतों के डर से लोग तेल का इस्तेमाल कम करें और प्रोड्यूसर्स को किसी भी तरह सप्लाई बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़े। यही वजह है कि राहत के बावजूद बड़े तेल व्यापारी अब भी अंदर से काफी नर्वस हैं।
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