US-Iran Round Two Talks: अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की कूटनीतिक वार्ता जल्द ही शुरू होने वाली है। CNN News18 द्वारा एक्सेस किए गए एजेंडे से साफ है कि दोनों देशों के बीच अभी भी गहरे मतभेद बरकरार हैं। जहां अमेरिका एक 'ग्रैंड बार्गेन' चाहता है, वहीं ईरान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय हितों से समझौता करने को तैयार नहीं है। आइए आपको बताते हैं आखिर किन मुद्दों पर फंस रहा है पेच।
परमाणु संवर्धन को लेकर 20 साल बनाम 5 साल की जंग
बातचीत की सबसे बड़ी रुकावट ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम है। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करे और कम से कम 20 साल तक संवर्धन पर रोक लगाए। ईरान इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है। तेहरान ने जवाबी प्रस्ताव में केवल 5 साल की रोक की बात कही है। अमेरिका ने प्रतिबंधों में ढील को 'वेरिएबल न्यूक्लियर स्टेप्स' से जोड़ दिया है, जबकि ईरान पहले सभी प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है।
होर्मुज पर कंट्रोल और पैसेज राइट्स पर विवाद
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब केवल एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि मोलभाव का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। दोनों देश इस बात पर बंटे हुए हैं कि इस जलमार्ग का संचालन और रेगुलेशन कौन करेगा। साथ ही जलसंधि से गुजरने वाले जहाजों पर नियंत्रण और 'पैसेज फीस' को लेकर भी एजेंडे में शामिल है। इसका असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ना तय है।
क्षेत्रीय सुरक्षा और 'प्रॉक्सि' नेटवर्क
अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने सहयोगी समूहों का साथ छोड़ दे। अमेरिका दबाव बना रहा है कि ईरान हिजबुल्लाह और हुती विद्रोहियों को सैन्य सहायता देना बंद करे।जवाब में ईरान ने अपने सहयोगियों विशेषकर लेबनान पर हमलों को रोकने के लिए अमेरिका से ठोस सुरक्षा गारंटी मांगी है।
लेबनान की स्थिति ने इस बातचीत को और पेचीदा बना दिया है। हिजबुल्लाह के वरिष्ठ अधिकारी वाफिक सफा ने दो टूक कहा है कि वे अमेरिका में चल रही लेबनान-इजरायल वार्ता के किसी भी नतीजे को नहीं मानेंगे। जहां लेबनान सरकार अमेरिका के जरिए युद्धविराम चाहती है, वहीं इजरायल का मुख्य उद्देश्य हिजबुल्लाह को निहत्था करना है। इस खींचतान ने ईरान और अमेरिका की बातचीत में नया तनाव जोड़ दिया है।
मिसाइल प्रोग्राम: अमेरिका ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर भी सीमाएं तय करना चाहता है।
मुआवजा: ईरान ने पिछले संघर्षों और प्रतिबंधों के कारण हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की है।
UN की भूमिका: क्रियान्वयन की निगरानी के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) समर्थित एक स्थायी ढांचा बनाने पर भी चर्चा संभव है।