ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी जंग का असर अब पूरी दुनिया होता दिख रहा है। सुप्रीम लीडर सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत केबाद ईरान ने मिडिल ईस्ट में 8 देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। अब ईरान ने दुनिया के सबसे जरूरी तेल एक्सपोर्ट रूट होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने का ऐलान किया है। जानकारी के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही फिलहाल रुक गई है। यदि होर्मुज स्ट्रेट जल्द नहीं खुलता है तो भारत सहित पूरी दुनिया पर तेल सकंट गहरा सकता है। यह समुद्री रास्ता बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है।
ईरान ने 'होर्मुज स्ट्रेट' किया बंद
एनालिटिक्स कंपनी केप्लर के मुताबिक, 1 मार्च को इस रास्ते से भारत की ओर जाने वाला कोई भी तेल टैंकर नहीं देखा गया। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश का करीब 50 प्रतिशत मासिक कच्चा तेल और लगभग पूरी एलपीजी सप्लाई इसी अहम समुद्री मार्ग से होकर आती है। ऐसे में अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
नहीं गुजरा कोई भी तेल टैंकर
S&P ग्लोबल कमोडिटीज एट सी के शिप ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, 1 मार्च को होर्मुज स्ट्रेट से कोई भी तेल टैंकर नहीं गुजरा। बताया जा रहा है कि ब्लॉकेड की खबरों के बाद जहाज मालिकों ने जोखिम को देखते हुए अपने जहाजों के रास्ते बदल दिए हैं और स्थिति का फिर से आकलन कर रहे हैं। एनालिटिक्स कंपनी केप्लर ने भी पुष्टि की कि 1 मार्च को इस अहम समुद्री मार्ग से भारत की ओर जाने वाला कोई टैंकर ट्रैफिक नहीं था, क्योंकि उस दिन कोई भी तेल जहाज इस शिपिंग रूट से नहीं निकला। केप्लर के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट निखिल दुबे ने मनीकंट्रोल से बातचीत में बताया कि, 27 फरवरी तक दुनिया भर में करीब 19 मिलियन बैरल कच्चा तेल होर्मुज स्ट्रेट से गुजर रहा था, जो 28 फरवरी को घटकर 18 मिलियन बैरल रह गया। वहीं 1 मार्च तक इस रास्ते से केवल एक टैंकर गुजर रहा था, जो करीब 2 मिलियन बैरल तेल लेकर यूरोप की ओर जा रहा था।
ईरान ने जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने से बचने की चेतावनी दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस इलाके के पास तीन जहाज़ों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई हैं। बता दें कि, यह समुद्री रास्ता अपने सबसे संकरे हिस्से में करीब 33 किलोमीटर चौड़ा है और दुनिया के लिए बेहद अहम माना जाता है। एनालिटिक्स कंपनी केप्लर के अनुसार, तनाव बढ़ने से पहले इस रास्ते से कच्चे तेल की आवाजाही काफी ज्यादा थी। 27 और 28 फरवरी को हर दिन करीब 10 से 11 तेल टैंकर यहां से गुजर रहे थे, लेकिन 1 मार्च तक स्थिति बदल गई और सिर्फ एक ही कच्चा तेल टैंकर इस रास्ते से निकल पाया। S&P ग्लोबल कमोडिटीज़ एट सी ने भी बताया कि दक्षिणी ईरान और यूएई-ओमान के तट के बीच स्थित होर्मुज स्ट्रेट के मुख्य शिपिंग चैनल से पूर्व से पश्चिम दिशा में जाने वाला कोई भी कच्चे तेल या पेट्रोलियम उत्पाद ले जाने वाला टैंकर दिखाई नहीं दिया।
फ्यूल सप्लाई पर बढ़ी चिंता
केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी महीने में भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते हर दिन करीब 2.8 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात किया। जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा लगभग 2.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। इससे साफ है कि भारत की तेल सप्लाई इस समुद्री मार्ग पर काफी हद तक निर्भर है। इक्रा लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और कॉर्पोरेट रेटिंग्स के को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ ने बताया कि दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल तेल और पेट्रोलियम पदार्थों का करीब 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है, तो उसका असर पूरी वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। वहीं S&P ग्लोबल कमोडिटीज़ एट सी के डेटा के मुताबिक, 1 मार्च तक यूएई के फुजैराह पोर्ट के पास, कई कच्चे तेल के टैंकर खड़े दिखाई दिए। बताया जा रहा है कि कई जहाज़ आगे बढ़ने के बजाय फिलहाल पोर्ट की ओर रुख कर रहे हैं।
शिपिंग एनालिटिक्स और रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञ राहुल कपूर ने कहा कि, होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापारिक समुद्री रास्तों में से एक है। ऐसे में अगर यहां लंबे समय तक रुकावट बनी रहती है, तो इसके दूरगामी असर देखने को मिल सकते हैं। इससे जहाज़ों की क्षमता में अचानक बदलाव, जोखिम बढ़ने और माल ढुलाई की लागत यानी फ्रेट रेट में उतार-चढ़ाव आ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए कई जहाज़ अपने रास्ते बदल सकते हैं। इससे जहाज़ों की उपलब्धता कम हो सकती है, यात्रा का समय बढ़ सकता है और समुद्री व्यापार की लागत पर भी असर पड़ सकता है। साथ ही अलग-अलग क्षेत्रों के बीच होने वाले व्यापारिक संतुलन में भी बदलाव आने की संभावना है। राहुल कपूर ने बताया कि खास तौर पर बड़े तेल टैंकर (VLCC) के लिए दूरी और समय दोनों बढ़ सकते हैं। इससे खाली और भरे हुए जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित होगी, क्षेत्र में जहाज़ों की कमी महसूस हो सकती है और पूरी शिपिंग अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।