ईरान युद्ध को लेकर US और इजरायल में बढ़ी तकरार! जंग में नेतन्याहू और ट्रंप के टारगेट अलग-अलग
US Israel Iran War: ट्रंप जहां जल्दी जीत चाहते हैं और चाहते हैं कि आर्थिक नुकसान कम हो, वहीं नेतन्याहू लंबे समय से ईरान की सरकार को पूरी तरह गिराना चाहते हैं। यानी अब दोनों की रणनीति में फर्क साफ नजर आ रहा है। इस जंग में अब तक 13 अमेरिकी नागरिकों की मौत हो चुकी है और वैश्विक बाजारों पर भी इसका असर दिख रहा है
ईरान युद्ध को लेकर US और इजरायल में बढ़ी तकरार! जंग में नेतन्याहू और ट्रंप के टारगेट अलग-अलग (IMGAE- AI)
पिछले महीने जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ जंग शुरू की, तब दोनों का मकसद एक ही था- ईरान की सरकार को बदलना। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की जनता से कहा कि यह उनके लिए “सरकार अपने हाथ में लेने का बड़ा मौका” है। वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी लोगों से मौजूदा शासन को हटाने की अपील की। लेकिन करीब तीन हफ्ते बाद अब दोनों देशों के लक्ष्य अलग-अलग दिखने लगे हैं।
ट्रंप जहां जल्दी जीत चाहते हैं और चाहते हैं कि आर्थिक नुकसान कम हो, वहीं नेतन्याहू लंबे समय से ईरान की सरकार को पूरी तरह गिराना चाहते हैं। यानी अब दोनों की रणनीति में फर्क साफ नजर आ रहा है।
गैस फील्ड पर हमले से बढ़ी दरार
Washington Post की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया।
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को इस हमले की जानकारी नहीं थी और कतर का भी इसमें कोई रोल नहीं था। लेकिन कई अधिकारियों ने बताया कि इजरायल ने पहले ही अमेरिका को इस हमले की जानकारी दे दी थी।
इस हमले के बाद तेल-गैस की कीमतें बढ़ गईं और ईरान ने कतर और सऊदी अरब में जवाबी मिसाइल हमले भी किए।
ट्रंप की दुविधा: जीत भी, चिंता भी
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप एक तरफ ईरान को हुए नुकसान से खुश हैं, लेकिन दूसरी तरफ दुनिया भर में पड़ रहे आर्थिक असर से चिंतित भी हैं।
इस जंग में अब तक 13 अमेरिकी नागरिकों की मौत हो चुकी है और वैश्विक बाजारों पर भी इसका असर दिख रहा है।
इजरायल का बड़ा मकसद
इजरायल इस जंग को अपने पुराने दुश्मन को कमजोर करने के बड़े मौके के तौर पर देख रहा है।
उसने हजारों हमले किए हैं, जिनमें से लगभग 40% ईरान की सुरक्षा एजेंसियों और ठिकानों पर हुए हैं। कई बड़े नेता और सैन्य अधिकारी भी मारे गए हैं, जिनमें सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का नाम भी शामिल बताया जाता है।
सच्चाई ये है कि अमेरिका और इजरायल दोनों के खुफिया अधिकारियों का मानना है कि इतने हमलों के बावजूद ईरान की सरकार अभी भी मजबूत बनी हुई है और सत्ता पर उसकी पकड़ कायम है।
अमेरिका के असली लक्ष्य
व्हाइट हाउस के मुताबिक, अमेरिका के चार मुख्य लक्ष्य हैं:
ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को खत्म करना
ईरानी नौसेना को नष्ट करना
क्षेत्रीय सहयोगियों को कमजोर करना
उसे परमाणु हथियार बनाने से रोकना
यानी अमेरिका सीधे सरकार बदलने पर जोर नहीं दे रहा।
अमेरिका-इजरायल के बीच मतभेद
हालांकि इजरायल कहता है कि वह अमेरिका के साथ पूरी तरह तालमेल में है, लेकिन कई अधिकारियों के मुताबिक, जंग के दूसरे हफ्ते से ही दोनों के बीच मतभेद दिखने लगे।
खासकर तब, जब इजरायल ने ईरान के तेल ठिकानों पर बड़े हमले किए और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा।
एक अमेरिकी अधिकारी ने साफ कहा कि इजरायल “पूरी तबाही” की रणनीति अपना रहा है, जबकि ट्रंप चाहते हैं कि ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह नष्ट न हो।
क्या सिर्फ हवाई हमलों से सरकार बदलेगी?
इजरायल के अधिकारियों का मानना है कि सिर्फ हवाई हमलों से किसी सरकार को गिराना मुश्किल होता है। इसके लिए जमीनी कार्रवाई, बगावत या जनता का बड़ा आंदोलन जरूरी होता है।
इसलिए उम्मीद की जा रही है कि लगातार हमलों से ईरान के अंदर विरोध बढ़ेगा और सरकार पर दबाव बनेगा।
कुछ अधिकारियों का मानना है कि अगर ईरान में लोग सड़कों पर उतरते हैं, तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि वहां की सुरक्षा एजेंसियां अभी भी मजबूत हैं।
जंग का असर और राजनीति
इजरायल में इस जंग को लेकर भारी समर्थन है और ज्यादातर लोग चाहते हैं कि यह तब तक जारी रहे जब तक ईरान की सरकार गिर न जाए।
इजरायल ने ईरान के कई सुरक्षा ठिकानों पर हमले किए हैं और दावा किया है कि उसने हजारों सैनिकों को मार गिराया है। हालांकि, नागरिकों के नुकसान का आंकड़ा साफ नहीं है।
मौजूदा स्थिति और आगे क्या?
अभी तक ईरान की सरकार बनी हुई है और पहले से ज्यादा सख्त रुख में दिख रही है।
तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं और होर्मुज स्ट्रेट अब भी ज्यादातर बंद है।
ट्रंप अब यह सोच रहे हैं कि क्या जंग को और बढ़ाया जाए, जैसे कि जमीनी सैनिक भेजे जाएं। लेकिन यह फैसला राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। फिलहाल ट्रंप ने संकेत दिया है कि वे अभी सैनिक भेजने के पक्ष में नहीं हैं।