ईरान ने बढ़ाया जंग का दायरा! हिंद महासागर में US-UK के डिएगो गार्सिया मिलिट्री बेस पर दागीं दो बैलिस्टिक मिसाइल

US Iran War: डिएगो गार्सिया का यह बेस ईरान से करीब 4,000 किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी तक हमला करने की क्षमता पहले ईरान के पास नहीं मानी जाती थी। इसका मतलब है कि अब ईरान यूरोप में मौजूद सैन्य ठिकानों को भी निशाना बना सकता है। यह बेस ईरान और चीन जैसे देशों की गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें जवाब देने के लिए भी बेहद अहम माना जाता है

अपडेटेड Mar 21, 2026 पर 12:59 PM
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ईरान ने बढ़ाया जंग का दायरा! हिंद महासागर में US-UK के डिएगो गार्सिया मिलिट्री बेस पर दागीं दो बैलिस्टिक मिसाइल (FILE PHOTO)

ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग अब हिंद महासागर तक पहुंच गई है। हाल ही में दो अलग-अलग बड़े हमलों से यह साफ हो गया है कि अब युद्ध का दायरा और बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने चागोस द्वीप समूह के डिएगो गार्सिया में अमेरिका और ब्रिटेन के मिलिट्री बेस पर दो बैलिस्टिक मिसाइल दागीं। हालांकि, दोनों मिसाइल अपने तारगेट तक नहीं पहुंच पाईं। एक मिसाइल रास्ते में ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत से छोड़े गए इंटरसेप्टर ने रोकने की कोशिश की, लेकिन वह पूरी तरह नष्ट हुई या नहीं, यह साफ नहीं है।

डिएगो गार्सिया का यह बेस ईरान से करीब 4,000 किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी तक हमला करने की क्षमता पहले ईरान के पास नहीं मानी जाती थी। इसका मतलब है कि अब ईरान यूरोप में मौजूद सैन्य ठिकानों को भी निशाना बना सकता है।

अमेरिका के रक्षा विभाग (पेंटागन) ने इस मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।


पूर्व भारक केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि अगर यह खबर सही है, तो ईरान ने जंग का दायरा बढ़ा दिया है और पश्चिमी देशों को साफ संदेश दे दिया है।

इससे कुछ हफ्ते पहले ही हिंद महासागर में एक और बड़ी घटना हुई थी। श्रीलंका के दक्षिण में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के युद्धपोत “IRIS डेना” को टॉरपीडो से डुबो दिया था, जिसमें 85 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। यह जहाज भारत की तरफ से आयोजित ‘मिलन 2026’ नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद लौट रहा था।

पेंटागन पहले ही कह चुका है कि ईरान की नौसेना को खत्म करना इस युद्ध के मुख्य उद्देश्यों में से एक है, जो 28 फरवरी से शुरू हुआ था।

डिएगो गार्सिया का यह बेस पहले भी अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी बमबारी अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जा चुका है। यह ब्रिटेन के दो ऐसे ठिकानों में से एक है, जहां से अमेरिका फिलहाल ईरान के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है।

ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह की सत्ता मॉरीशस को वापस देने पर सहमति जताई है, लेकिन डिएगो गार्सिया बेस के लिए लीज अपने पास रखी है। वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले का विरोध किया है।

अमेरिका के व्हाइट हाउस, वॉशिंगटन स्थित ब्रिटिश दूतावास और ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने इस मामले पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

इसी बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने लक्ष्य के “बहुत करीब” पहुंच चुका है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कई हफ्तों की भारी लड़ाई के बाद अब अमेरिका अपनी सैन्य कार्रवाई को धीरे-धीरे खत्म करने पर विचार कर रहा है।

ईरान की तरफ से करीब 4,000 किलोमीटर दूर स्थित डिएगो गार्सिया बेस को निशाना बनाने की कोशिश से यह संकेत मिलता है कि उसकी मिसाइलों की रेंज पहले से ज्यादा हो सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पिछले महीने कहा था कि देश ने अपनी मिसाइलों की रेंज 2,000 किलोमीटर तक सीमित रखी है।

डिएगो गार्सिया क्यों महत्वपूर्ण है?

डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित एक बेहद अहम सैन्य ठिकाना है, जहां अमेरिका और ब्रिटेन का बड़ा बेस है।

यह इलाका ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी का हिस्सा है, लेकिन यहां का संचालन ज्यादातर अमेरिका करता है। यह बेस अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया में हवाई और नौसैनिक ऑपरेशन के लिए एक बड़ा केंद्र है।

इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका के सैन्य अभियानों में इस बेस की बड़ी भूमिका रही है। यहां से लंबी दूरी के बमवर्षक विमान उड़ान भरते हैं और नौसेना की तैनाती, जैसे पनडुब्बियां और निगरानी मिशन, को सपोर्ट मिलता है।

इसकी दूरदराज लोकेशन की वजह से यहां पहले से ही हथियार, ईंधन और दूसरे सैन्य सामान रखा जाता है, जिससे किसी भी संकट में तुरंत कार्रवाई की जा सके।

साथ ही, यह बेस ईरान और चीन जैसे देशों की गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें जवाब देने के लिए भी बेहद अहम माना जाता है। इसे अमेरिका के सबसे सुरक्षित विदेशी सैन्य ठिकानों में से एक माना जाता है।

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