Venezuela Crisis: वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, फिर बर्बाद क्यों है ये मुल्क? वजह कर देगी हैरान

Venezuela Crisis: दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार होने के बावजूद वेनेजुएला आर्थिक तबाही का शिकार है। जनता भुखमरी, महंगाई और पलायन से त्रस्त है। अमेरिका के हमले (US Attacks Venezuela) ने स्थिति को और खराब कर दिया है। वेनेजुएला की बर्बादी सिर्फ सोशलिज्म की कहानी नहीं है। तेल, सत्ता, अमेरिका और गलत फैसलों ने कैसे इस देश को रसातल में पहुंचाया, जानिए पूरी सच्चाई।

अपडेटेड Jan 03, 2026 पर 7:56 PM
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वेनेजुएला की सरकार ने लंबे समय तक लोगों को राहत देने के नाम पर भारी सब्सिडी दी।


Venezuela Crisis: वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बडा तेल भंडार है। करीब 303 बिलियन बैरल यानी वैश्विक तेल भंडार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा। यह आंकडा सुनते ही दिमाग में एक ही तस्वीर बनती है- अमीर देश, मजबूत अर्थव्यवस्था, खुशहाल लोग। लेकिन जमीन पर हकीकत बिल्कुल उलटी है। महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, पलायन और टूटती व्यवस्था। सवाल यही है कि जब तेल इतना है, तो देश इतना बदहाल कैसे हो गया।

इसका जवाब किसी एक वजह में नहीं छिपा। यह कहानी कई गलत फैसलों, कमजोर संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय दबावों से मिलकर बनी है।

तेल है, लेकिन निकालना आसान नहीं

वेनेजुएला का ज्यादातर तेल बहुत भारी और गाढा है। यह वह तेल नहीं है जो जमीन से निकलते ही रिफाइनरी में चला जाए। इस तेल को पहले पतला करना पडता है, खास केमिकल मिलाने पडते हैं और फिर उसे प्रोसेस करने में ज्यादा खर्च आता है। यानी हर बैरल तेल निकालने की लागत पहले से ही ज्यादा है।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम नीचे जाते हैं, तो वेनेजुएला के लिए तेल निकालना फायदे का सौदा नहीं रह जाता। कागज पर भंडार बहुत बडा दिखता है, लेकिन हकीकत में उसे पैसे में बदलना मुश्किल हो जाता है।

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PDVSA कमजोर हुई, तो पूरा सिस्टम हिल गया

वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA कभी देश की रीढ़ थी। लेकिन समय के साथ इस कंपनी पर सियासत हावी हो गई। प्रोफेशनल फैसलों की जगह राजनीतिक फैसले होने लगे। निवेश रुक गया, मशीनें पुरानी होती गईं और मेंटेनेंस पर ध्यान नहीं दिया गया।

सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि हुनरमंद इंजीनियर और टेक्निकल लोग देश छोडकर चले गए। कम सैलरी, अनिश्चित भविष्य और दबाव भरे माहौल में कोई टिकना नहीं चाहता था। नतीजा यह हुआ कि तेल उत्पादन तेजी से गिरा। बाद में कुछ सुधार जरूर दिखा, लेकिन आज भी वेनेजुएला अपनी पुरानी क्षमता के आसपास भी नहीं पहुंच पाया है।

सिर्फ तेल पर टिकी अर्थव्यवस्था का जाल

वेनेजुएला ने धीरे धीरे अपनी पूरी अर्थव्यवस्था तेल के भरोसे छोड़ दी। अर्थव्यवस्था का 90% से ज्यादा एक्सपोर्ट और करीब 95% विदेशी मुद्रा कमाई तेल पर निर्भर थी। खेती कमजोर हो गई, फैक्ट्रियां बंद होती चली गईं और दूसरे निर्यात सेक्टर खत्म होते गए। जब तेल से पैसा आ रहा था, तब यह कमजोरी दिखी नहीं।

लेकिन जैसे ही तेल के दाम गिरे, पूरी व्यवस्था चरमराने लगी। देश के पास कोई दूसरा मजबूत सहारा नहीं था। इसी को एक्सपर्ट संसाधन का श्राप (resource curse) कहते हैं। जब प्राकृतिक संसाधन देश को मजबूत करने के बजाय उसे एक ही चीज पर निर्भर बना देते हैं।

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सब्सिडी और कंट्रोल, जो बाद में आफत बने

वेनेजुएला की सरकार ने लंबे समय तक लोगों को राहत देने के नाम पर भारी सब्सिडी दी। पेट्रोल लगभग मुफ्त रहा, जरूरी सामान पर कीमतें तय कर दी गईं। शुरुआत में यह सब अच्छा रहा। खासकर, 2003 से 2012 के दरम्यान...जब ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें उफान पर थीं। वर्ल्ड बैंक के डेटा के मुताबिक, इस दौर में गरीबी दर करीब 50% से घटकर 27% तक आ गई। शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ा, और असमानता मापने वाला Gini coefficient भी बेहतर हुआ।

लेकिन, जब 2014 के बाद कच्चे तेल की कीमतें गिरीं, तो सरकार के पास न तो वैकल्पिक राजस्व था, न मजबूत टैक्स सिस्टम। IMF और OPEC के आंकड़ों के मुताबिक, देश का तेल उत्पादन 2000 के दशक की शुरुआत में 30 लाख बैरल प्रति दिन के आसपास था। वह 2023-24 तक गिरकर 7-8 लाख बैरल प्रति दिन रह गया। यानी संसाधन जमीन में थे, लेकिन निकालने और बेचने की क्षमता टूट चुकी थी।

करेंसी और महंगाई ने आम आदमी को तोड़ दिया

वेनेजुएला की सरकार ने खर्च चलाने के लिए बड़े पैमाने पर नोट छापना शुरू कर दिया। इससे उसकी करेंसी बोलीवर (Bolívar) की वैल्यू तेजी से गिरती चली गई। सैलरी बोलीवर में मिलती रही, लेकिन बाजार की कीमतें डॉलर के हिसाब से तय होने लगीं।

2018 में महंगाई दर 10,00,000% के करीब पहुंच गई। महंगाई इतनी बढ़ गई कि लोग थैले भरकर नोट ले जाते थे, फिर भी पूरा सामान नहीं खरीद पाते थे। जनता की दशकों की बचत रातों-रात बेकार हो गई। पूरी महीने की सैलरी से कुछ घंटों से ज्यादा गुजारा नहीं होता था। लेन-देन में डॉलर या बार्टर (सामान के बदले सामान) का चलन बढ़ा।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 75% से ज्यादा आबादी एक समय खाद्य असुरक्षा की चपेट में आ गई थी। इसके चलते 70 लाख से ज्यादा लोग देश छोड़कर बाहर चले गए, जो आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े पलायनों में से एक है।

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अमेरिकी प्रतिबंधों ने रास्ता और संकरा कर दिया

2019 के बाद अमेरिका ने वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों ने तेल बेचने, पैसा पाने, शिपिंग और इंश्योरेंस- हर चीज को मुश्किल बना दिया। इन प्रतिबंधों का सबसे अधिक असर सरकारी तेल कंपनी PDVSA पर पड़ा, जो देश की रेवेन्यू मशीन थी।

जो देश या कंपनियां तेल खरीदने को तैयार हुईं, उन्होंने साफ कहा कि रिस्क ज्यादा है, इसलिए तेल सस्ते में चाहिए। वेनेजुएला को मजबूरी में भारी डिस्काउंट पर तेल बेचना पडा। तेल निकला, लेकिन उससे इतनी कमाई नहीं हुई कि देश की हालत सुधर सके।

अमेरिका ने वेनेजुएला पर प्रतिबंध क्यों लगाए

अमेरिका ने वेनेजुएला पर प्रतिबंध मुख्य रूप से वहां के राजनीतिक हालात और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर लगाए थे। अमेरिकी सरकार का दावा था कि राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के शासन में चुनाव निष्पक्ष नहीं रहे। विपक्ष को दबाया गया। संसद और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर की गई। इसके साथ ही मानवाधिकार उल्लंघन, प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई और प्रेस की आजादी पर रोक जैसे आरोप भी प्रतिबंधों की बड़ी वजह बने।

दूसरा अहम कारण वेनेजुएला का तेल और भू-राजनीति से जुड़ा है। वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA पर लगाए गए प्रतिबंधों के जरिए अमेरिका का तर्क रहा कि तेल से होने वाली कमाई जनता की भलाई के बजाय सत्ता को बनाए रखने में इस्तेमाल हो रही है। साथ ही, वेनेजुएला की रूस, चीन और ईरान जैसे देशों से बढ़ती नजदीकियों ने भी अमेरिका को नाराज किया। इससे प्रतिबंधों का दायरा और सख्त होता चला गया।

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अब अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला क्यों किया?

अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की। राजधानी काराकस समेत कई इलाकों में हवाई हमले और धमाके हुए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे 'लार्ज-स्केल ऑपरेशन' बताया।

उन्होंने दावा किया कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर देश से बाहर ले जाया गया है। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई ड्रग तस्करी, अवैध प्रवासन और नार्को-टेररिज्म से जुड़े मामलों को लेकर की गई है। वहीं, वेनेजुएला सरकार ने इसे खुला सैन्य आक्रमण करार देते हुए देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर दिया है।

मादुरो की गिरफ्तारी पर था इनाम

अमेरिका का वेनेजुएला पर सैन्य हमला अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे लगातार बढ़ता तनाव है। पिछले साल अमेरिका ने वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध, तेल सेक्टर पर दबाव, सीआईए ड्रोन ऑपरेशंस और नौसैनिक तैनाती जैसे कदम उठाए थे।

ट्रंप प्रशासन लंबे समय से मादुरो सरकार को अवैध और अपराध से जुड़ा हुआ बताता रहा है, जो 2013 से सत्ता में हैं। 2020 में ड्रग-टेररिज्म के आरोपों के साथ मादुरो की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया, जो बाद में 20 मिलियन डॉलर तक पहुंचा।

वहीं, कई विश्लेषकों का मानना है कि इस टकराव की जड़ में वेनेजुएला का दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार और अमेरिका की भू-राजनीतिक रणनीति भी शामिल है। फिलहाल हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। पूरी दुनिया की इस संकट पर नजर है।

तनाव बढ़ने की आशंका बरकरार

अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से भले ही निकोलस मादुरो की सत्ता पर पकड़ कमजोर पड़ती दिखे, लेकिन हालात के और बिगड़ने का जोखिम अभी काफी ज्यादा है। वेनेजुएला लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी स्थायी सेनाओं में शामिल है और सरकार ऐसे सशस्त्र समर्थक समूहों पर भी निर्भर करती है, जिन्हें कलेक्टिवोस कहा जाता है।

अगर टकराव लंबा खिंचता है, तो इससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हो सकता है, बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट पैदा हो सकता है और यह बड़ा सवाल खड़ा हो सकता है कि मादुरो के हटने की स्थिति में देश किस दिशा में जाएगा।

फिलहाल संकेत यही हैं कि ट्रंप प्रशासन सैन्य दबाव बनाए रखने के मूड में है। ऐसे में स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है और आगे के नतीजों को लेकर अनिश्चितता बरकरार है।

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