Agriculture Tips: 20 दिन की चूक और पैदावार खत्म! चना की इस बीमारी से रहें सावधान

Agriculture Tips: रबी सीजन में चना किसानों की अहम नकदी फसल है। बुआई के शुरुआती 20–30 दिन में छोटी लापरवाही भी फसल को बर्बाद कर सकती है। इस दौरान ड्राई रूट रॉट, कॉलर रॉट और जड़ सड़न जैसी बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है। समय पर सतर्कता और उपचार से नुकसान टाला जा सकता है

अपडेटेड Dec 16, 2025 पर 12:02 PM
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Agriculture Tips: जड़ों में फफूंद और कीट लगते हैं, पौधा पूरी तरह सड़ जाता है।

रबी सीजन में चना किसानों की सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसल होती है। ये फसल सही तरीके और समय पर बुआई की जाए तो अच्छा मुनाफा देती है। लेकिन शुरुआती दिनों में अगर थोड़ी सी भी लापरवाही हो जाए, तो पूरे खेत की पैदावार प्रभावित हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बुआई के 20 से 30 दिन बाद चना में ड्राई रूट रॉट, कॉलर रॉट और जड़ सड़न जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा सबसे अधिक होता है। ये बीमारियां शुरुआती समय में ज्यादा दिखाई नहीं देतीं, लेकिन अगर समय रहते इसका उपचार न किया जाए, तो फसल जल्दी ही सूख सकती है। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इसलिए विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि बुआई के बाद खेत की लगातार निगरानी करें, संतुलित मात्रा में पानी दें और किसी भी रोग के लक्षण दिखते ही तुरंत उपचार करें। सही देखभाल से फसल सुरक्षित रहती है और अच्छी पैदावार सुनिश्चित होती है।

मध्य प्रदेश में स्थिति


खरगोन जिले में इस वर्ष करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर में चना की खेती हो रही है। अधिकांश खेतों में बुआई पूरी हो चुकी है, जबकि कुछ किसान अभी पिछेती बुआई कर रहे हैं। विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि फसल की शुरुआती अवस्था में सतर्क रहें, क्योंकि इन बीमारियों से पूरा खेत प्रभावित हो सकता है।

चना में बीमारी का मुख्य कारण

खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. जीएस कुलमी लोकल 18 से बात करते हुए बताते हैं कि बुआई के 20-30 दिन बाद कॉलर रॉट (ड्राई रूट) का खतरा सबसे अधिक होता है। अक्सर यह फफूंद जनित रोग खेतों में जरूरत से ज्यादा नमी या लापरवाही की वजह से फैल जाता है। इसलिए सिंचाई संतुलित मात्रा में करनी चाहिए।

फसल की सुरक्षा की पहली कड़ी

कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका बुआई से पहले बीजोपचार है। बीजोपचार करने से फसल सुरक्षित रहती है। इसके लिए फफूंदनाशक दवाइयों का इस्तेमाल करें:

  • ट्राईकोडर्मा – 5 ग्राम प्रति किलो बीज
  • वीटावेक्स पावर – 3 ग्राम प्रति किलो बीज इसके बाद राइजोबियम कल्चर और पीएसबी (पीएचबी) कल्चर 5-5 ग्राम प्रति किलो बीज मिलाकर उपचार करें। इससे पौधों में गांठ जल्दी बनती है और फसल की बढ़वार अच्छी होती है।

बीमारी दिखे तो तुरंत करें दवा का छिड़काव

अगर बीजोपचार के बाद भी बीमारी के लक्षण दिखें तो तुरंत दवा का छिड़काव करें।

  • कॉलर रॉट: पौधे हल्के पीले पड़ते हैं और सूखने लगते हैं।
  • जड़ सड़न: जड़ों में फफूंद और कीट लगते हैं, पौधा पूरी तरह सड़ जाता है।

उपाय:

  • मेटालेक्जिल + मैनकोज़ेब 30 ग्राम प्रति पंप पानी में मिलाकर ड्रेंचिंग या छिड़काव करें।
  • दवा न मिलने पर कार्बेंडाजिम 50 का उपयोग किया जा सकता है।

समय पर उपचार करके किसान अपनी फसल को नुकसान से बचा सकते हैं और अच्छी पैदावार सुनिश्चित कर सकते हैं।

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