छत्तीसगढ़ के किसान इन दिनों बढ़ती खेती की लागत और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता से काफी परेशान हैं। यूरिया, डीएपी और अन्य रसायनिक खाद के लगातार इस्तेमाल से लागत बढ़ती जा रही है और मिट्टी की उर्वरता भी कम हो रही है। ऐसे में कुछ किसानों ने एक नया मॉडल अपनाया है, जिसमें खेती और मुर्गी पालन को जोड़ा गया है। इस तरीके में मुर्गियों के बीट से तैयार होने वाला जैविक खाद खेतों में इस्तेमाल किया जाता है। मुर्गियों का मल-मूत्र भूंसी के साथ मिलकर कुछ समय में पोषक तत्वों से भरपूर खाद बन जाता है,
जो रासायनिक उर्वरकों से अधिक प्रभावी साबित होता है। इससे मिट्टी की संरचना सुधरती है, भूमि उपजाऊ बनती है और प्राकृतिक रूप से खेतों में केंचुए बढ़ते हैं। इस मॉडल से किसानों की लागत कम होती है और उत्पादन व मुनाफा दोनों बढ़ते हैं।
मुर्गी बीट से तैयार जैविक खाद
अनुभवी किसान और मुर्गी पालक घनश्याम रात्रे बताते हैं कि मुर्गियों के बीट से तैयार होने वाला खाद खेती के लिए वरदान से कम नहीं है। पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों के लिए फर्श पर भूंसी डाली जाती है। मुर्गियां इस भूसी पर मल-मूत्र त्याग करती हैं, जो कुछ समय में पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में बदल जाता है। यह खाद यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों से कई गुना अधिक प्रभावी साबित होता है।
खेती में मिट्टी की सेहत सुधारना
घनश्याम रात्रे लोकल 18 से बात करते हुए बताते हैं कि पोल्ट्री फार्म से इस मिश्रित भूसी को नियमित रूप से इकट्ठा कर सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। खेतों में इसे खाद के रूप में इस्तेमाल करने से मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बनती है। लगातार रासायनिक उर्वरक डालने से मिट्टी सख्त हो जाती है, लेकिन मुर्गी बीट खाद से मिट्टी की संरचना सुधरती है और केंचुओं की संख्या बढ़ती है, जो प्राकृतिक रूप से भूमि की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है।
सभी प्रकार की फसलों में उपयोग
मुर्गी बीट खाद का उपयोग सभी प्रकार की खेती में किया जा सकता है – धान, सब्जियां या फलदार पौधे। इसका प्रभाव हर जगह देखा गया है। हालांकि घनश्याम रात्रे किसानों को सलाह देते हैं कि इसका इस्तेमाल जरूरत के अनुसार ही करें, क्योंकि यह डीएपी की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक प्रभावी है।
बड़ी मात्रा में खाद उत्पादन
अगर कोई किसान एक बार में लगभग 3000 मुर्गियों का पालन करता है, तो उसे करीब चार ट्रॉली खाद प्राप्त होती है। इस खाद से लगभग चार एकड़ खेत में खेती की जा सकती है। घनश्याम रात्रे खुद 7 एकड़ भूमि में खेती करते हैं और नियमित मुर्गी बीट खाद के इस्तेमाल से उन्हें रासायनिक उर्वरकों की जरूरत बहुत कम पड़ती है।
घनश्याम रात्रे के अनुसार, इस जैविक खाद के उपयोग से प्रति एकड़ फसल उत्पादन में करीब 30 क्विंटल या उससे अधिक की बढ़ोतरी होती है। इससे किसानों की आमदनी बढ़ती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता। उनका अनुभव दिखाता है कि मुर्गी पालन और खेती का ये संयोजन ग्रामीण किसानों के लिए टिकाऊ और लाभकारी विकल्प बन सकता है।