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मुर्गियों का मल-मूत्र बना खेतों का सोना, जानिए इस्तेमाल का तरीका

छत्तीसगढ़ के किसान बढ़ती खेती की लागत और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता से परेशान हैं। ऐसे में कुछ किसानों ने खेती और मुर्गी पालन को जोड़कर नया मॉडल अपनाया है। मुर्गियों के बीट से तैयार जैविक खाद मिट्टी की सेहत सुधारता है, उपज बढ़ाता है और लागत कम करता है, जिससे किसान अधिक मुनाफा कमा सकते हैं

MoneyControl Newsअपडेटेड Jan 08, 2026 पर 11:50 AM
मुर्गियों का मल-मूत्र बना खेतों का सोना, जानिए इस्तेमाल का तरीका
खेतों में इसे खाद के रूप में इस्तेमाल करने से मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बनती है।

छत्तीसगढ़ के किसान इन दिनों बढ़ती खेती की लागत और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता से काफी परेशान हैं। यूरिया, डीएपी और अन्य रसायनिक खाद के लगातार इस्तेमाल से लागत बढ़ती जा रही है और मिट्टी की उर्वरता भी कम हो रही है। ऐसे में कुछ किसानों ने एक नया मॉडल अपनाया है, जिसमें खेती और मुर्गी पालन को जोड़ा गया है। इस तरीके में मुर्गियों के बीट से तैयार होने वाला जैविक खाद खेतों में इस्तेमाल किया जाता है। मुर्गियों का मल-मूत्र भूंसी के साथ मिलकर कुछ समय में पोषक तत्वों से भरपूर खाद बन जाता है,

जो रासायनिक उर्वरकों से अधिक प्रभावी साबित होता है। इससे मिट्टी की संरचना सुधरती है, भूमि उपजाऊ बनती है और प्राकृतिक रूप से खेतों में केंचुए बढ़ते हैं। इस मॉडल से किसानों की लागत कम होती है और उत्पादन व मुनाफा दोनों बढ़ते हैं।

मुर्गी बीट से तैयार जैविक खाद

अनुभवी किसान और मुर्गी पालक घनश्याम रात्रे बताते हैं कि मुर्गियों के बीट से तैयार होने वाला खाद खेती के लिए वरदान से कम नहीं है। पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों के लिए फर्श पर भूंसी डाली जाती है। मुर्गियां इस भूसी पर मल-मूत्र त्याग करती हैं, जो कुछ समय में पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में बदल जाता है। यह खाद यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों से कई गुना अधिक प्रभावी साबित होता है।

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