अगर इस बार आपने अपने खेत में आलू की फसल लगाई है, तो अब सतर्क रहने का समय है। थोड़ी सी लापरवाही आपकी महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है। आलू की खेती किसानों के लिए आय का एक अहम स्रोत मानी जाती है, लेकिन इसमें लगने वाली कुछ गंभीर बीमारियां पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कई बार किसान शुरुआत में लक्षणों को हल्के में ले लेते हैं, जिसका खामियाजा बाद में भारी नुकसान के रूप में भुगतना पड़ता है। झुलसा, स्कर्फ और विषाणु रोग जैसी समस्याएं आलू की पैदावार और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करती हैं। अगर इन रोगों की समय रहते पहचान न की जाए और सही उपाय न अपनाए जाएं, तो उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।
इसलिए जरूरी है कि किसान फसल की नियमित निगरानी करें, रोगों के शुरुआती लक्षणों को समझें और तुरंत वैज्ञानिक तरीके से बचाव करें, ताकि अच्छी पैदावार और बेहतर कमाई सुनिश्चित की जा सके।
कृषि विशेषज्ञ प्रो. अशोक कुमार सिंह के अनुसार, आलू की खेती में झुलसा रोग सबसे खतरनाक माना जाता है। यह दो तरह का होता है—अगेती झुलसा और पछेती झुलसा। इसकी शुरुआत पत्तियों पर छोटे भूरे या काले धब्बों से होती है, जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को जला देते हैं। नमी बढ़ने पर पत्तियों के नीचे रुई जैसी फफूंद दिखने लगती है। तनों पर दाग पड़ते हैं और कंद छोटे होकर सड़ने लगते हैं।
स्कर्फ रोग से घटती है कंद की गुणवत्ता
स्कर्फ एक फंगल बीमारी है, जो कंदों पर असर डालती है। यह दो प्रकार की होती है—ब्लैक स्कर्फ और सिल्वर स्कर्फ। इसमें आलू पर काले, मिट्टी जैसे धब्बे बन जाते हैं, जिससे बाजार में उसकी कीमत कम हो जाती है।
विषाणु रोग से रुक जाता है पौधे का विकास
विषाणु रोग में पौधों की पत्तियां छोटी, मुड़ी और पीली हो जाती हैं। पौधा ठीक से बढ़ नहीं पाता और पैदावार काफी घट जाती है। यह बीमारी एफिड और जैसिड जैसे कीट फैलाते हैं।
पोटाश से बढ़ेगा कंद का आकार और गुणवत्ता
आलू की फसल में पोटाश की भूमिका बहुत अहम होती है। कम से कम दो बार पोटाश देना जरूरी है।
1 किलो पोटाश को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से आलू के कंद बड़े, मजबूत और अच्छी गुणवत्ता वाले बनते हैं।