मध्य प्रदेश के शिवपुरी में इन दिनों खेती का एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है, जिसने किसानों के सोचने का तरीका बदल दिया है। कलौंजी की फसल अब सिर्फ एक मसाले तक सीमित नहीं रही, बल्कि कमाई का मजबूत जरिया बनती जा रही है। किसान इसे “कम जोखिम, ज्यादा फायदा” वाली खेती मानने लगे हैं। खास बात यह है कि इस फसल में ज्यादा निवेश या मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती, फिर भी इसका रिटर्न उम्मीद से कहीं बेहतर मिल रहा है। यही कारण है कि छोटे और सीमांत किसान भी तेजी से इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।
गांवों में अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ कलौंजी की खेती एक नए विकल्प के रूप में उभर रही है, जो किसानों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में मजबूत कदम उठाने का मौका दे रही है।
कम लागत, आसान खेती का फॉर्मूला
जोराई गांव के किसान दुर्गेश धाकड़ बताते हैं कि एक बीघा में कलौंजी उगाने में ज्यादा खर्च नहीं आता। बीज, जुताई और देखभाल मिलाकर लगभग 5 से 6 हजार रुपये में फसल तैयार हो जाती है। पानी की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती, सिर्फ एक-दो सिंचाई में काम चल जाता है। 4-5 महीने में तैयार होने वाली यह फसल छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रही है।
जानवरों से भी सुरक्षित, नहीं होता नुकसान
कलौंजी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी खेती में आवारा जानवरों से नुकसान का खतरा नहीं रहता। इसकी तेज गंध के कारण मवेशी इसे खाते नहीं हैं और खेत के पास भी नहीं भटकते। इससे किसानों को रात-रात भर खेत की रखवाली नहीं करनी पड़ती और उनका समय व मेहनत दोनों बचते हैं।
अगर पैदावार की बात करें तो एक बीघा में करीब ढाई से तीन क्विंटल उत्पादन मिल जाता है। बाजार में अच्छा भाव मिलने पर किसान 60 से 70 हजार रुपये तक कमा लेते हैं। पहले इतनी कम लागत में इतना मुनाफा मिलना मुश्किल था, लेकिन अब कलौंजी ने कमाई का नया रास्ता खोल दिया है।
सरकार भी दे रही साथ, बढ़ रहा रुझान
कृषि विभाग के अनुसार, कलौंजी की खेती किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है। विभाग किसानों को नई तकनीक और उन्नत फसलों के बारे में जागरूक कर रहा है। इसके सकारात्मक नतीजों को देखकर अब ज्यादा किसान इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
खेती में बदलाव की नई मिसाल
कलौंजी ने साबित कर दिया है कि सही फसल का चुनाव किसानों की किस्मत बदल सकता है। कम जोखिम और ज्यादा मुनाफे के कारण यह खेती अब ग्रामीण इलाकों में नई उम्मीद बनती जा रही है।