छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में खेती का तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है और किसान अब पारंपरिक ज्ञान के साथ नए देसी प्रयोग अपना रहे हैं। इन्हीं में से एक है मटका खाद, जिसने कम खर्च में बेहतर उत्पादन का रास्ता खोल दिया है। पहले जिस मटके का इस्तेमाल सिर्फ पानी ठंडा रखने के लिए होता था, अब वही खेती के लिए पौष्टिक जैविक खाद तैयार करने में काम आ रहा है। इस तकनीक को अंबिकापुर के कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है, जहां किसानों को इसकी ट्रेनिंग भी दी जा रही है।
खास बात ये है कि इसमें महंगे संसाधनों की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि घर और पशुओं से मिलने वाली साधारण चीजों से ही खाद तैयार हो जाती है। इससे न केवल लागत घट रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिल रहा है।
मटका खाद बनाने का आसान तरीका
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक मटका खाद तैयार करना बेहद सरल है। इसके लिए गौमूत्र, गोबर, सब्जियों के छिलके, बेसन, गुड़ और हल्दी जैसी चीजों को एक मटके में डालकर 15–20 दिनों तक सड़ने दिया जाता है। कुछ ही दिनों में ये मिश्रण पौष्टिक जैविक खाद में बदल जाता है, जिसे सीधे खेतों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस तैयार खाद को पानी में मिलाकर खेत में डालने से महंगे केमिकल फर्टिलाइजर की जरूरत कम हो जाती है। साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता भी बनी रहती है, जिससे लंबे समय तक अच्छी पैदावार मिलती है। छोटे किसानों के लिए ये तकनीक काफी फायदेमंद साबित हो रही है।
किचन वेस्ट बना खेत की ताकत
इस विधि की खासियत ये है कि इसमें घर से निकलने वाला जैविक कचरा भी काम आता है। यानी जो चीजें पहले बेकार जाती थीं, अब वही खेत के लिए पोषण बन रही हैं। ये एक तरह से प्राकृतिक रीसाइक्लिंग है, जो पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है।
सब्जियों की खेती में जबरदस्त असर
विशेषज्ञों का मानना है कि मटका खाद का असर खासकर सब्जियों की खेती में ज्यादा देखने को मिलता है। छोटे क्षेत्र में इसका उपयोग आसान होता है और फसल की ग्रोथ जल्दी नजर आती है।
गर्मी के मौसम में जब पानी की कमी होती है, तब यह खाद और ज्यादा उपयोगी साबित होती है। इसे सिंचाई के साथ जड़ों में देने से पौधे मजबूत बनते हैं और उनकी वृद्धि बेहतर होती है।
किसानों को मिल रही ट्रेनिंग
सरगुजा के कृषि विज्ञान केंद्र में किसानों को मटका खाद के साथ-साथ बीजामृत और जीवामृत जैसी तकनीकों की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। इससे किसान कम लागत में टिकाऊ और प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।