मशरूम की खेती आज छोटे और सीमित जमीन वाले किसानों के लिए किस्मत बदलने वाला विकल्प बन गई है। पारंपरिक फसलों जैसे धान और गेहूं में लगातार लागत बढ़ने और मुनाफा कम होने की समस्या से परेशान किसान अब नई दिशा की तलाश में हैं। ऐसे में मशरूम की खेती उन्हें न केवल कम लागत में अच्छी आमदनी का अवसर देती है, बल्कि यह पारंपरिक खेती की तुलना में कम जगह, कम मेहनत और जल्दी मुनाफा देने वाली फसल के रूप में उभर रही है। मशरूम उगाने के लिए किसान को बड़ी जमीन या उपजाऊ मिट्टी की जरूरत नहीं होती। इसे घर के किसी खाली और अंधेरे कमरे में भी आसानी से उगाया जा सकता है।
थोड़ी सी ट्रेनिंग और कृषि विशेषज्ञों की सलाह से किसान केवल 2–3 महीने में ही हजारों रुपये तक की कमाई कर सकते हैं। यही कारण है कि इसे किसानों की नजर में ‘व्हाइट गोल्ड’ कहा जा रहा है। इसमें सही तकनीक और ध्यान से उगाने पर किसान आर्थिक रूप से मजबूत बन सकते हैं और खेती के नए आयाम छू सकते हैं
कम जगह, कम लागत और जल्दी मुनाफा
मशरूम की खेती के लिए उपजाऊ जमीन की जरूरत नहीं होती। इसे आप अपने घर के किसी खाली और अंधेरे कमरे में भी उगा सकते हैं। यह फसल नियंत्रित तापमान और नमी में पनपती है। सिर्फ 2 महीने में किसान हजारों रुपये का मुनाफा कमा सकते हैं।
किस्मों और तकनीक का महत्व
शाहजहांपुर के कृषि विशेषज्ञ डॉ. हादी हुसैन खान के अनुसार, मशरूम की खेती में तकनीक और धैर्य जरूरी है। सबसे ज्यादा लाभ के लिए ऑयस्टर, बटन और मिल्की मशरूम उगाना चाहिए। 10 बैग से शुरू करने पर 10x10 मीटर क्षेत्र से लगभग 80 हजार रुपये तक की आमदनी हो सकती है। एक बार स्पॉन डालने के बाद 3-4 बार कटाई की जा सकती है, जिससे यह फसल आर्थिक रूप से मजबूत बनती है।
मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार भी किसानों को मदद देती है। सामान्य और पिछड़ा वर्ग के किसानों को 40%–50% तक अनुदान मिलता है। अनुसूचित जाति के किसानों के लिए विशेष प्रावधान हैं। किसान ग्रामोद्योग या जिला उद्यान कार्यालय के माध्यम से 100% अनुदान भी ले सकते हैं, यानी जीरो इन्वेस्टमेंट में व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।
अनुदान लेने के लिए किसानों को अपने दस्तावेज स्थानीय उद्यान विभाग में जमा करने होते हैं। यहां उन्हें प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दोनों दी जाती है, जिससे मशरूम की खेती सरल और लाभदायक बन जाती है।