आलू की बुवाई का सही समय क्षेत्र और तापमान पर निर्भर करता है। उत्तर भारत में आमतौर पर आलू की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच की जाती है, जब दिन का तापमान 18 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। इस अवधि में तापमान और मिट्टी की नमी फसल की अच्छी वृद्धि और कंद के विकास के लिए अनुकूल मानी जाती है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है, इसलिए अब किसान अपनी फसल की सुरक्षा को लेकर सतर्क हो गए हैं। जैसे-जैसे ठंड बढ़ती है और कोहरा पड़ता है, आलू की फसल में रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषकर झुलसा रोग, लेट ब्लाइट, अर्ली ब्लाइट और मोज़ेक जैसी बीमारियों का प्रकोप अधिक नमी और ठंडी रातों में तेजी से फैलता है। इसलिए इस समय किसानों को अपने आलू के खेतों में विशेष ध्यान देने और रोग नियंत्रण के उपाय अपनाने की जरूरत है, ताकि फसल का उत्पादन सुरक्षित और लाभकारी बना रहे।
आलू की फसल में लेट ब्लाइट, अर्ली ब्लाइट, मोज़ेक रोग, काला पपड़ी (ब्लैक स्कर्फ) और सॉफ्ट रॉट प्रमुख हैं। ये रोग पत्तियों के झुलसने, पौधों की वृद्धि रुकने और कंद सड़ने का कारण बनते हैं। दिसंबर माह में कोहरा और नमी के कारण झुलसा रोग तेजी से फैलता है, जिससे किसान चिंतित रहते हैं।
कृषि विशेषज्ञ डॉ. सुहेल खान के अनुसार, झुलसा रोग मुख्य रूप से फफूंद के कारण होता है। अधिक नमी, लगातार कोहरा, ठंडी रातें और 18–22 डिग्री तापमान में ये तेजी से फैलता है। पत्तियों पर छोटे भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं, जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को झुलसा देते हैं। गंभीर स्थिति में तना कमजोर हो जाता है और कंदों में सड़न शुरू हो जाती है।
रोगमुक्त बीज कंद का प्रयोग करें, खेत में जल निकास को सही रखें और संतुलित उर्वरक दें। रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही मैंकोजेब या क्लोरोथालोनिल का छिड़काव करें। यदि प्रकोप बढ़ जाए तो मेटालेक्सिल और मैंकोजेब जैसे फफूंदनाशक दवाओं का उपयोग करें।
खीरी जिले में आलू की खेती बड़े स्तर पर होती है। डॉ. सुहेल खान का कहना है कि झुलसा रोग का समय पर उपचार न करने से उत्पादन में भारी गिरावट हो सकती है। किसान हर वर्ष फसल चक्र अपनाएं और संक्रमण बढ़ने पर तुरंत फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करें, जिससे मिट्टी में फंगस पनपने की संभावना कम हो जाए।