मौसम के बदलते मिजाज ने इस बार गेहूं की फसल के सामने नई परेशानी खड़ी कर दी है। तापमान में अचानक बढ़ोतरी और नमी में उतार-चढ़ाव का असर सीधे बालियों पर दिखाई देने लगा है। कई इलाकों में किसान देख रहे हैं कि गेहूं की बालियां समय से पहले काली पड़ रही हैं, जिससे चिंता और असमंजस की स्थिति बन गई है। खेत में लहलहाती फसल के बीच जब कुछ बालियां रंग बदलने लगती हैं, तो यह केवल सामान्य बदलाव नहीं होता, बल्कि किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। इस तरह की स्थिति का प्रभाव सिर्फ देखने तक सीमित नहीं रहता।
काली पड़ती बालियां दानों के विकास को प्रभावित करती हैं, जिससे उत्पादन घट सकता है। साथ ही अनाज की गुणवत्ता भी कमजोर हो जाती है, जिसका असर बाजार भाव पर पड़ता है। ऐसे में समय रहते कारण समझना और सही कदम उठाना किसानों के लिए बेहद जरूरी हो जाता है।
कौन से रोग हैं जिम्मेदार?
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ के अनुसार यह समस्या मुख्य रूप से करनाल बंट और अनावृत कंडुआ जैसे फफूंदजनित रोगों के कारण होती है। अनावृत कंडुआ में पूरी बाली काले पाउडर में बदल जाती है, जबकि करनाल बंट में दानों का कुछ हिस्सा काला होकर बदबू देने लगता है। दोनों ही स्थितियां उत्पादन को नुकसान पहुंचाती हैं।
संक्रमण दिखे तो तुरंत करें ये काम
अगर खेत में काली पाउडर जैसी बाली नजर आए, तो उसे तुरंत अलग कर नष्ट करें। ध्यान रखें कि संक्रमित हिस्सा हवा में न फैले, वरना बीमारी पूरे खेत में फैल सकती है।
सही दवा और समय पर छिड़काव है जरूरी
रोग को बढ़ने से रोकने के लिए समय पर फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव बेहद जरूरी है। विशेषज्ञ सलाह के अनुसार प्रोपिकोनाजोल, टेबुकोनाजोल या कार्बेंडाजिम का संतुलित उपयोग लाभकारी हो सकता है।
अगली फसल के लिए अपनाएं समझदारी
बीज उपचार, फसल चक्र और साफ-सफाई जैसी सावधानियां भविष्य में इस रोग से बचाव का मजबूत उपाय हैं। प्रभावित खेत के बीज दोबारा उपयोग न करें और बीच-बीच में दलहनी फसलें लें, ताकि मिट्टी स्वस्थ रहे और रोग का खतरा कम हो।