वित्त अधिनियम 2022 के साथ भारत में क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल परिसंपत्तियों को पहली बार स्पष्ट रूप से टैक्स के दायरे में लाया गया।
Budget 2026: वित्त अधिनियम 2022 के साथ भारत में क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल परिसंपत्तियों को पहली बार स्पष्ट रूप से टैक्स के दायरे में लाया गया। इन्हें सामूहिक रूप से वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) कहा गया। केंद्रीय बजट 2022 में वित्त मंत्री ने यह साफ किया था कि डिजिटल परिसंपत्तियों में लेनदेन का आकार और रफ्तार इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इसके लिए एक अलग टैक्स ढांचा जरूरी हो गया है। यह कदम इस बात का संकेत था कि सरकार ने भारत की वित्तीय व्यवस्था में क्रिप्टो और डिजिटल एसेट्स की बढ़ती भूमिका को स्वीकार कर लिया है और अब इन्हें अनौपचारिक दायरे से निकालकर टैक्स सिस्टम के भीतर लाना चाहती है।
हाल के संसदीय आंकड़े बताते हैं कि भारत में क्रिप्टो इकोनॉमी तेजी से बढ़ी है। वित्त वर्ष 2024-25 में क्रिप्टो लेनदेन का कुल आंकड़ा 51,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रहा, जो पिछले साल की तुलना में करीब 41 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाता है। इन लेनदेन से मिलने वाला टीडीएस कलेक्शन भी बढ़कर लगभग 512 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसका साफ मतलब है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स अब सिर्फ कुछ लोगों का शौक या सीमित निवेश का साधन नहीं रहे, बल्कि देश के वित्तीय बाजार का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं।
इसके बावजूद, क्रिप्टो से जुड़ा नियामकीय ढांचा अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। टैक्स नियम तो बना दिए गए हैं, लेकिन वे काफी सख्त हैं और कई जगह व्यावहारिक दिक्कतें पैदा करते हैं। फिलहाल VDA के ट्रांसफर से होने वाली आय पर 30 प्रतिशत की फ्लैट टैक्स दर लागू है। इसमें खरीद लागत के अलावा किसी भी तरह की कटौती की अनुमति नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर किसी को क्रिप्टो में नुकसान होता है, तो उसे न तो किसी अन्य आय से समायोजित किया जा सकता है और न ही आगे के सालों में कैरी फॉरवर्ड किया जा सकता है। इसके अलावा, हर लेनदेन पर 1 प्रतिशत टीडीएस भी काटा जाता है, जिसकी न्यूनतम सीमा सिर्फ 10,000 रुपये है।
आम निवेशकों के लिए यह नियम काफी भारी साबित हो रहे हैं। बार-बार टीडीएस कटने से ट्रेडिंग के लिए पूंजी फंस जाती है और छोटे निवेशकों के लिए सक्रिय रूप से ट्रेड करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि कई लोग विदेशी एक्सचेंजों या अनौपचारिक प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख कर रहे हैं। यह स्थिति सरकार के लिए भी नुकसानदायक है, क्योंकि इससे घरेलू प्लेटफॉर्म कमजोर होते हैं और टैक्स अनुपालन पर भी असर पड़ता है। हालांकि क्रिप्टो अपनाने के मामले में भारत अब भी दुनिया के अग्रणी देशों में है, लेकिन घरेलू क्रिप्टो इकोसिस्टम लगातार अनिश्चितता और सीमाओं से जूझ रहा है।
सरकार की मंशा को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। पारदर्शिता और अनुपालन बढ़ाने के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं। वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स को फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU) के साथ पंजीकरण करना अनिवार्य कर दिया गया है। उन्हें सख्त केवाईसी और मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों का पालन करना होता है। बजट 2025 में VDA से जुड़े लेनदेन के लिए रिपोर्टिंग नियमों को और सख्त किया गया। भारत ने यह भी संकेत दिया है कि वह 2027 तक ओईसीडी के क्रिप्टो-एसेट रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क को लागू करेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पारदर्शिता बढ़ेगी।
अब सवाल यह है कि आगे की राह कैसी होनी चाहिए। इस संदर्भ में बजट 2026 एक अहम मौका बन सकता है, जहां सरकार क्रिप्टो और डिजिटल परिसंपत्तियों के टैक्स ढांचे को ज्यादा संतुलित और व्यावहारिक बना सकती है। कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
सबसे पहला मुद्दा टैक्स व्यवस्था पर पुनर्विचार का है। 30 प्रतिशत की फ्लैट टैक्स दर, नुकसान की समायोजन की अनुमति न होना और 1 प्रतिशत टीडीएस—ये तीनों मिलकर निवेशकों पर बहुत ज्यादा बोझ डालते हैं। अगर टीडीएस की दर कम की जाए, नुकसान को आगे ले जाने या अन्य आय से समायोजित करने की अनुमति दी जाए और टैक्स दर पर भी दोबारा विचार हो, तो इससे निवेशक देश के भीतर ही ज्यादा सक्रिय रहेंगे। इससे टैक्स कलेक्शन भी लंबे समय में बेहतर हो सकता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा यह है कि VDA से होने वाले लाभ को किस श्रेणी में रखा जाए। क्या इसे पूंजीगत लाभ माना जाए या व्यापारिक आय? मौजूदा कानून में यह बात साफ नहीं है। हालांकि टैक्स दर एक जैसी है, लेकिन वर्गीकरण का असर ऑडिट, खुलासे और लागत निर्धारण पर पड़ता है। अगर यह स्पष्ट कर दिया जाए कि किन हालात में VDA को निवेश और किन में व्यापार माना जाएगा, तो अनुपालन आसान हो जाएगा।
तीसरा मुद्दा अधिग्रहण लागत का है। कई बार क्रिप्टो अलग-अलग कीमतों पर खरीदा जाता है, स्टेकिंग या रिवॉर्ड के जरिए मिलता है या फिर ट्रेडिंग के लिए स्टॉक की तरह रखा जाता है। ऐसे में सही लागत कैसे तय की जाए, इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। अगर इस पर साफ नियम बना दिए जाएं, तो टैक्स विवाद कम होंगे।
चौथा पहलू उपहार में मिले क्रिप्टो से जुड़ा है। अगर किसी को क्रिप्टो गिफ्ट में मिलता है, तो आयकर कानून की धारा 56 के तहत उस पर टैक्स लग सकता है। लेकिन उचित बाजार मूल्य कैसे तय किया जाए, इस पर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। क्रिप्टो की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव को देखते हुए, खास वैल्यूएशन नियम बनाना जरूरी है।
पांचवां और अहम मुद्दा गैर-निवासियों के टैक्सेशन का है। क्रिप्टो एक अमूर्त संपत्ति है और आमतौर पर मालिक के निवास स्थान के आधार पर टैक्स तय होता है। लेकिन अगर लेनदेन भारतीय एक्सचेंज पर हुआ हो, भुगतान भारत में मिला हो या एसेट भारतीय संस्था से जुड़ा हो, तो भारत का टैक्स अधिकार बन सकता है। इस पर भी स्पष्ट नियमों की जरूरत है।
कुल मिलाकर, भारत को एक ऐसा क्रिप्टो टैक्स ढांचा चाहिए जो साफ, तार्किक और भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया हो। ऐसा ढांचा जो निवेशकों को डराए नहीं, बल्कि अनुपालन के लिए प्रोत्साहित करे। दुनिया तेजी से डिजिटल एसेट्स की ओर बढ़ रही है। अगर भारत सही संतुलन बना पाता है, तो वह न सिर्फ टैक्स कलेक्शन बढ़ा सकता है, बल्कि एक मजबूत और भरोसेमंद डिजिटल एसेट इकोनॉमी भी खड़ी कर सकता है। बजट 2026 इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।