भारत अगले साल के लिए अपना आर्थिक रास्ता तय कर रहा है और इस बीच इंश्योरेंस सेक्टर परिवारों की वित्तीय योजना और जोखिम कम करने के लिहाज से मुख्य स्तंभ बना हुआ है। हाल के नियामकीय प्रयासों और पहलों से इस सेक्टर की वृद्धि को समर्थन मिला है, लेकिन व्यापक इंश्योरेंस संबंधी आंकड़ों से पता चलता है कि इस दिशा में अभी भी काफी प्रयास करना बाकी है।
भारतीय इंश्योरेंस नियामक एवं विकास प्राधिकरण की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष ‘24 में भारत का कुल इंश्योरेंस विस्तार सकल घरेलू उत्पाद का 3.7 प्रतिशत था, जिसमें जीवन इंश्योरेंस कीवह हिस्सेदारी 2.8 प्रतिशत थी। यह स्तर 7 प्रतिशत से ज़्यादा के वैश्विक औसत से कम है। पीडब्ल्यूसी इंडिया की इंश्योरेंस समावेश से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ग्रामीण इलाके में, जहां लगभग 65 प्रतिशत आबादी रहती है, वहां 10 प्रतिशत से भी कम लोगों के पास जीवन इंश्योरेंस है। ये बातें इस बात की याद दिलाती हैं कि प्रगति के बावजूद, आबादी के बड़े हिस्से के लिए वित्तीय सुरक्षा की उपलब्धता सीमित है।
आगामी बजट नीतिगत समर्थन बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। नीचे दिए गए मेरे सुझावों का लक्ष्य है, ग्राहकों को बेहतर लाभ प्रदान करना, दीर्घकालिक बचत में भागीदारी बढ़ाना और वित्तीय समावेश और लचीलेपन के राष्ट्रीय लक्ष्यों का समर्थन करना।
भारत के पेंशन परितंत्र में अभी भी भारी कमी है। राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली और अन्य औपचारिक पेंशन योजनाओं का लगातार विस्तार हो रहा है, लेकिन मर्सर-सीएफए इंस्टीट्यूट ग्लोबल पेंशन इंडेक्स 2025 के अनुसार, भारत का औपचारिक पेंशन कवरेज कार्यबल की तादाद के मुकाबले 25% से कम है। इस रिपोर्ट में पेंशन पर्याप्तता के मामले में भारत को 47 देशों में से 45वें स्थान पर रखा गया है। जीवन इंश्योरेंस एन्युटी उत्पाद और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली दोनों का लक्ष्य है, रिटायरमेंट आय का समर्थन करना, लेकिन इसके बावजूद उन पर लगने वाले कर में काफी फर्क है।
इंश्योरेंस एन्युटी के पेमेंट पर पूरी राशि कर योग्य होती है। इसमें वह मूलधन भी शामिल होता है जिस पर निवेश या आय अर्जित करने (अर्निंग) के दौरान कर लागू हो चुका होता है। दूसरी ओर, एनपीएस खरीदारों को अपने और नियोक्ता के योगदान के लिए अतिरिक्त कटौती का लाभ मिलता है। दोनों में कर देनदारी के लिहाज़ से यह फर्क ग्राहकों के फैसलों को अक्सर उत्पाद की उपयुक्तता से अधिक प्रभावित करता है।
वित्तीय उत्पाद का अनुकूल और बेहतर कर ढांचा, जैसे केवल एन्युटी पेमेंट के मामले में रिटर्न पर कर लगाना और इंश्योरेंस एन्युटी पेंशन उत्पाद पर तुलनीय कटौती की सुविधा आदि से लोगों को कर लाभ के बजाय अपनी दीर्घकालिक ज़रूरतों के आधार पर चुनने में मदद मिलेगी। ऐसे अनुकूलन से देश में अधिक लोगों को व्यवस्थित रिटायरमेंट योजना बनाने का प्रोत्साहन मिलेगा।
पिछले कुछ साल में अधिक मूल्य वाली पारम्परिक इंश्योरेंस नीति के साथ अलग तरह का बर्ताव किया गया है। उदाहरण के लिए, सालाना 5 लाख रुपये से अधिक प्रीमियम वाली पॉलिसी के मामले में परिपक्वता पर मिलने वाली रकम पर अब नियमित आयकर दर के आधार पर कर का पेमेंट करना पड़ता है। ये पॉलिसी, जो अनुशासित तरीके से पैसे जमा करने के साथ-साथ व्यापक जीवन इंश्योरेंस सुरक्षा प्रदान करती हैं, उन्हें निवेश के अन्य विकल्पों की तुलना में कम आकर्षक माना जाने लगा है।
इस बीच, अधिक मूल्य वाली यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी, जिनका सालाना कुल प्रीमियम 2.5 लाख रुपये से अधिक है, उन्हें दीर्घकालिक पूंजी लाभ सुविधा मिलती है, जो आमतौर पर ज़्यादा फायदेमंद और कर के लिहाज़ से बेहतर होती है। इसलिए, ज़्यादा मूल्य वाली पारंपरिक इंश्योरेंस पॉलिसी पर भी पूंजी लाभ पर इसी तरह की कर की दर लागू करने और दोनों को एक तरह के कर प्रावधान के तहत लाने से निरंतरता आएगी, कर संहिता आसान होगी, और ज़्यादा लोगों-खास तैयार पर व्यवसायियों, दोहरी आय वाले परिवारों और वरिष्ठ पेशेवरों को सुरक्षा के साथ बचत करने के लिए बढ़ावा मिलेगा।
लेखक - तरुण चुघ, प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी, बजाज लाइफ इंश्योरेंस