Budget 2026: फिस्कल पॉलिसी में दिखने वाला है स्ट्रक्चरल बदलाव, मार्केट बॉरोइंग पर रहेगी सबसे ज्यादा नजर

सरकार का कैपेक्स, सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और स्ट्रक्चरल सुधारों पर फोकस, सस्टेनेबल ग्रोथ की संभावनाओं को मजबूत करता है। सरकार से उम्मीद है कि वह इनवेस्टर की कम दिलचस्पी और ज्यादा लॉन्ग टर्म यील्ड को देखते हुए लंबी अवधि वाले बॉन्ड्स पर निर्भरता कम करेगी

अपडेटेड Jan 27, 2026 पर 2:30 PM
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बजट 2026 में नए डेट फ्रेमवर्क के हिसाब से राजकोषीय घाटा GDP के लगभग 4.3% पर रहने का लक्ष्य रखा जा सकता है।

दीपक अग्रवाल

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्रीय बजट पेश करने की तारीख नजदीक आ चुकी है। देश की राजकोषीय नीति (फिस्कल पॉलिसी) में एक स्ट्रक्चरल बदलाव होने वाला है। सरकार राजकोषीय घाटे के टारगेट से डेट एंकर्ड फ्रेमवर्क की ओर बढ़ रही है। इस फ्रेमवर्क का मतलब है- ऐसी आर्थिक व्यवस्था, जिसमें सरकार अपने कर्ज को एक तय सीमा में रखने को आधार बनाती है। यह तय करती है कि डेट-टू-GDP रेशियो एक निश्चित स्तर से ज्यादा नहीं होगा।

इस बदलाव से केंद्र सरकार के डेट रेशियो पर फोकस होगा, जिसे वित्त वर्ष 2027 में GDP के लगभग 55.10% पर सेट किए जाने की उम्मीद है। इस बदलाव से राजको​षीय घाटे के बजाय प्राइमरी डेफिसिट, मार्केट के लिए मॉनिटर करने लायक मुख्य चीज बन जाता है। नॉमिनल GDP ग्रोथ में सुधार और ब्याज दर के स्थिर होने की उम्मीद है। ऐसे में GDP के 1% से कम प्राइमरी डेफिसिट को मीडियम टर्म डेट टारगेट को पूरा करने के लिए काफी होना चाहिए, ताकि फिस्कल कंसोलिडेशन आक्रामक तरीके से नहीं बल्कि धीरे-धीरे आगे बढ़ सके।


वित्त वर्ष 2026 के लिए टैक्स रेवेन्यू उम्मीद से कम रहने का अनुमान है। साथ ही सरकार की कमाई लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये कम रह सकती है। इसके बावजूद उम्मीद है कि सरकार राजकोषीय घाटे के GDP के 4.4% पर रहने के अपने लक्ष्य को हासिल कर लेगी। RBI से सामान्य से ज्यादा डिविडेंड मिलने और खर्चों पर सख्ती, खासकर रेवेन्यू खर्च पर कंट्रोल से हो सकता है कि टैक्स की कमी का असर काफी हद तक संतुलित हो गया हो।

इनकम टैक्स में राहत मिलने और GST को तर्कसंगत बनाए जाने के बाद खपत में सुधार होने लगा है। इससे ग्रोथ को सपोर्ट मिल रहा है। हालांकि ग्लोबल टैरिफ पर टेंशन एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स पर भारी पड़ रही हैं। नॉमिनल GDP ग्रोथ पहले की उम्मीदों से कम रही है, जिससे फिस्कल मैथमेटिक्स में मुश्किलें बढ़ गई हैं।

FY27 के लिए क्या रह सकता है राजकोषीय घाटे का टारगेट

बजट 2026 में नए डेट फ्रेमवर्क के हिसाब से राजकोषीय घाटा GDP के लगभग 4.3% पर रहने का लक्ष्य रखा जा सकता है। मार्केट बॉरोइंग यानि कि बाजार से लिए जाने वाले कर्ज पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी। 4.3% के राजकोषीय घाटे पर भी ग्रॉस इश्यूएंस यानि कि कुल उधारी बढ़कर 16.5 लाख करोड़ रुपये तक जा सकती है। अगर सरकार RBI के साथ बॉन्ड स्विच करती है और T बिल का इस्तेमाल करती है, तो ग्रॉस बॉरोइंग प्रोग्राम 16 लाख करोड़ रुपये से कम का भी रह सकता है। नेट बॉरोइंग 12 लाख करोड़ रुपये के करीब रहने की संभावना है।

सरकार से उम्मीद है कि वह इनवेस्टर की कम दिलचस्पी और ज्यादा लॉन्ग टर्म यील्ड को देखते हुए लंबी अवधि वाले बॉन्ड्स पर निर्भरता कम करेगी। बॉरोइंग साइकिल को आसान बनाने में RBI की भूमिका अहम बनी रहेगी। केंद्रीय बैंक के पास वित्त वर्ष 2027 में मैच्योर होने वाले लगभग 1 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड हैं। इन्हें स्विच के जरिए रीफाइनेंस किया जाए या फिर सेकेंडरी मार्केट ऑपरेशंस के जरिए एब्जॉर्ब किया जाए, लिक्विडिटी की स्थिति पर असर पड़ना तय है।

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SDL जारी करने का स्केल हो सकता है असली टेस्ट

राज्यों के फाइनेंस पर भी दबाव बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2027 में स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDL) जारी करने का स्केल असली टेस्ट हो सकता है। OMO बॉन्ड की खरीद, बैंकिंग सिस्टम में ड्यूरेबल लिक्विडिटी एड करने के मुख्य सोर्स के तौर पर इस्तेमाल की जा रही है। इसलिए डिमांड-सप्लाई इक्वेशन के बैलेंस्ड रहने की संभावना है।

सरकार का कैपेक्स, सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और स्ट्रक्चरल सुधारों पर फोकस, सस्टेनेबल ग्रोथ की संभावनाओं को मजबूत करता है। इसलिए यह रुपये और कैपिटल मार्केट के लिए पॉजिटिव हो सकता है। कम ग्रॉस उधार (16 लाख करोड़ रुपये से कम) वाला, कुशल स्विच ऑपरेशंस और सीमित लॉन्ग एंड इश्यू वाला मार्केट फ्रेंडली बजट, फिक्स्ड इनकम इनवेस्टर्स के लिए पॉजिटिव होगा।

(दीपक अग्रवाल, कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी में चीफ इनवेस्टमेंट ऑफिसर (डेट फंड) हैं। दीपक कॉमर्स में पोस्ट ग्रेजुएट, चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी हैं।)

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