Economic Survey 2025-26: पिछले चार से पांच वर्षों में भारत में गिग इकॉनमी तेजी से आगे बढ़ी है। हालांकि गिग वर्कर्स की इनकम में उतार-चढ़ाव यानी अस्थिरता अब भी चिंता की बात बनी हुई है। इकनॉमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक करीब 40% गिग वर्कर्स की हर महीने की इनकम ₹15,000 से कम है। वहीं गिग वर्कर्स के संख्या की बात करें तो वित्त वर्ष 2021 में 77 लाख से 55% बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 1.2 करोड़ पर पहुंच गई। गिग वर्कर्स की संख्या में यह उछाल स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल और डिजिटल पेमेंट में तेजी के चलते आई है। यह कितना बड़ा हो चुका है, इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि गिग सेक्टर अब देश के कुल वर्कफोर्स का 2% से अधिक हिस्सा बन चुका है और कुल रोजगार की तुलना में कहीं अधिक स्पीड से बढ़ रहा है। इकनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वित्त वर्ष 2029-30 तक नॉन-एग्रीकल्चरल गिग्स की कुल वर्कफोर्स में हिस्सेदारी 6.7% हो जाएगी जिनका जीडीपी में ₹2.35 लाख करोड़ का योगदान होगा।
Gig Economy में सबसे अधिक ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी
इकनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक गिग वर्कर्स सबसे अधिक ई-कॉमर्स सेक्टर में हैं। इसके बाद लॉजिस्टिक्स और BFSI (बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज एंड इंश्योरेंस) सेक्टर में सबसे अधिक गिग वर्कर्स हैं। मार्च 2025 के आखिरी तक के आंकड़ों के हिसाब से ई-कॉमर्स में 37 लाख गिग वर्कर्स हैं तो लॉजिस्टिक्स में इसके आधे से भी कम 15 लाख और बीएफएसआई में 10 लाख। सबसे कम पावर एंड एनर्जी में हैं, महज 3 हजार। यहां नीचे इकनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट से सेक्टरवाइज गिग वर्कफोर्स की डिटेल्स दी जा रही है-
गिग वर्कर्स को लेकर क्या हैं चुनौतियां और समाधान?
पिछले कुछ वर्षों से गिग इकॉनमी तेजी से बढ़ रही है लेकिन इनकम में अस्थिरता बनी हुई है जिसके चलते उन्हें बैंकों से कर्ज हासिल करने में भी दिक्कत आती है। इकनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक प्लेटफॉर्म एल्गोरिद्म उनके काम करने की जगह तय करते हैं, परफॉरमेंस पर निगरानी रखते हैं, मेहनताना तय करते हैं और साथ ही सप्लाई और डिमांड का मिलान करते हैं तो पक्षपात और थकान को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। साथ ही सीमित स्किल डेवलपमेंट के साथ-साथ एआई और मशीन लर्निंग जैसों तकनीकों के चलते रोजगार जाने का डर बना रहता है।
इकनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक गिग वर्कर्स को लेकर ऐसी नीतियां होनी चाहिए कि रेगुलेर और गिग एंप्लॉयमेंट के बीच लागत का फर्क कम हो। इसके लिए इंसेंटिव पर लिमिट लगाया जा सकता है और हर घंटे या हर काम के लिए एक न्यूनतम कमाई का प्रावधान किया जा सकता है जिसमें वेंटिंग टाइम के लिए पेमेंट का भी विकल्प हो। इकनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक इन तरीकों से फॉर्मल हायरिंग को बढ़ावा मिल सकता है और कम स्किल वाले गिग वर्कर्स की इनकम बढ़ सकती है।