सरकार को हर नए वित्त वर्ष की अपनी इनकम और खर्च के अनुमान पर संसद की मंजूरी हासिल करनी पड़ती है। इसके लिए सरकार बजट पेश करती है। केंद्र सरकार के बजट को यूनियन बजट कहा जाता है। सरकार हर साल 1 फरवरी को यूनियन बजट पेश करती है। लेकिन, कुछ स्थितियों में सरकार यूनियन बजट की जगह अंतरिम बजट या वोट ऑन अकाउंट पेश करती है। सवाल है कि बजट और वोट ऑन अकाउंट में क्या फर्क है? आइए इसका जवाब जानने की कोशिश करते हैं।
वोट ऑन अकाउंट का मतलब क्या है?
हर पांच साल पर लोकसभा चुनाव होते हैं। लोकसभा चुनाव वाले साल में केंद्र सरकार फुल बजट (Full Budget) पेश करने से बचती है। इसकी वजह यह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से पहले यह पता नहीं होता कि कौन सी पार्टी नई सरकार बनाएगी। इसलिए सरकार नई सरकार बनने तक के जरूरी खर्चों के लिए वोट ऑन अकाउंट (Vote on Account) पेश करती है। आम तौर पर यह दो या चार महीनों के खर्च के लिए होता है। इस पर सरकार संसद की मंजूरी हासिल करती है। वोट ऑन अकाउंट का प्रावधान संविधान के आर्टिकल 116 में है। इसमें कहा गया है कि जरूरत पड़ने पर सरकार अपने जरूरी खर्चों के लिए कंसॉलिडेटेड फंड का इस्तेमाल कर सकती है।
फुल बजट सरकार कब पेश करती है?
केंद्र सरकार का कार्यकाल 5 साल को होता है। चुनाव वाले सरकार फुल बजट नहीं पेश करती है। इसका मतलब है कि वह बाकी चार साल फुल बजट पेश करती है। इस बार केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार 1 फरवरी, 2025 को फुल बजट पेश करेगी। फुल बजट में आम तौर पर सरकार की आय, खर्च, टैक्स के नियमों में बदलाव, अलग-अलग मंत्रालयों के बजट का आवंटन का प्रस्ताव शामिल होता है। यह सब नए वित्त वर्ष के लिए होता है। इंडिया में नए वित्त वर्ष की शुरुआत 1 अप्रैल से होती है। इसका समापन 31 मार्च को होता है। बजट पेश करने की जिम्मेदारी वित्त मंत्री पर होती है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी, 2025 को वित्त वर्ष 2025-26 का फुल बजट पेश करेंगी।
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अगला यूनियन बजट कैसा होगा?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर 1 फरवरी, 2025 को ऐसा बजट पेश करने का चैलेंज है, जिसमें इकोनॉमी की ग्रोथ बढ़ाने वाले उपाय होंगे। इसकी वजह यह है कि इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ घटकर 5.4 फीसदी पर आ गई। अगर इंडिया को 5 ट्रिलियल डॉलर यानी 5 लाख करोड़ रुयये वाली इकोनॉमी बनना है तो इकोनॉमी ग्रोथ बढ़ानी होगी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस साल मई में लोकसभा चुनाव होने से आचार संहिता लागू हो गई, जिससे सरकार के पूंजीगत खर्च की रफ्तार सुस्त पड़ गई। इसका असर इकोनॉमिक ग्रोथ पर पड़ा।