देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की गतिविधियों की ग्रोथ दिसंबर महीने में पिछले 2 साल के सबसे निचले स्तर पर रही। नए ऑर्डर में धीमी वृद्धि इसकी मुख्य वजह रही। शुक्रवार को जारी मासिक सर्वे में यह बात सामने आई। HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) नवंबर के 56.6 से गिरकर दिसंबर में 55 पर आ गया। PMI की भाषा में 50 से ऊपर का अंक विस्तार, जबकि 50 से नीचे का अंक गिरावट दर्शाता है।
HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI सर्वे द्वारा ट्रैक किए गए कई मापदंडों में 2025 कैलेंडर ईयर के अंत में ग्रोथ की गति धीमी हो गई। नए ऑर्डर्स में उछाल दो साल में सबसे कम रहा। उत्पादन वृद्धि 38 महीनों के निचले स्तर पर पहुंच गई।
धीमी ग्रोथ के बावजूद अच्छी रही 2025 की क्लोजिंग
S&P ग्लोबल मार्केट इंटेलीजेंस में अर्थशास्त्र की एसोसिएट डायरेक्टर पॉलियाना डी लीमा का कहना है, ‘‘ग्रोथ की गति धीमी होने के बावजूद भारत की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री ने 2025 की क्लोजिंग अच्छी स्थिति में की। नए बिजनेस में आई तेज वृद्धि से कंपनियों को वित्त वर्ष 2025-26 की अंतिम तिमाही व्यस्त रहने की उम्मीद है। प्रमुख मुद्रास्फीति दबावों की कमी मांग को सपोर्ट देना जारी रख सकती है।’’
कुल बिक्री में आई मंदी का एक कारण अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स में धीमी वृद्धि भी रही। नए निर्यात ऑर्डर्स में पिछले 14 महीनों में सबसे कम वृद्धि दर्ज की गई। दूसरी ओर एशिया, यूरोप और पश्चिम एशिया के ग्राहकों से बेहतर मांग देखने को मिली।
फैक्ट्री एंप्लॉयमेंट में मामूली बढ़ोतरी
नए बिजनेस मिलने में धीमी बढ़ोतरी के कारण कंपनियों ने इनपुट खरीदने की सीमा को सीमित कर दिया। इसके अलावा ऑपरेटिंग क्षमता पर दबाव की कमी के कारण दिसंबर में फैक्ट्री एंप्लॉयमेंट में मामूली बढ़ोतरी हुई। कीमतों के मोर्चे पर सर्वे में कहा गया कि कच्चे माल की लागत ऐतिहासिक रूप से न के बराबर रफ्तार से बढ़ी। चार्ज इनफ्लेशन की दर 9 महीनों के निचले स्तर पर आ गई है। भारतीय प्रोड्यूसर्स को 2026 में उत्पादन में वर्तमान स्तर की तुलना में वृद्धि की उम्मीद है। लीमा का कहना है, "चूंकि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को दूसरी जगहों की तुलना में लागत का कम दबाव झेलना पड़ रहा है, इसलिए कई लोग उम्मीद करेंगे कि कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग नए साल में दूसरे क्षेत्रों से नया बिजनेस लाने में मदद कर सकती है।"