भारत में निकट भविष्य का आउटलुक अनिश्चित बना हुआ है। बाहरी झटके विशेष रूप से पश्चिम एशिया संकट, कच्चे माल की उच्च लागत और सप्लाई में संभावित बाधाएं, ग्रोथ के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं। यह बात वित्त मंत्रालय ने एक रिपोर्ट में कही है। लेकिन यह भी कहा कि मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स और ठोस घरेलू मांग इन झटकों के असर को कम करने में मदद कर सकते हैं।
वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने मार्च महीने की मासिक आर्थिक समीक्षा (Monthly Economic Review) जारी की है। इसके अनुसार, वैश्विक घटनाओं ने भारत के लिए जटिल और बहुस्तरीय जोखिम पैदा कर दिए हैं। इसका कारण है कि देश एनर्जी का एक प्रमुख इंपोर्टर है। साथ ही पश्चिम एशिया क्षेत्र के साथ व्यापार, निवेश और रेमिटेंस के मामले में अच्छा जुड़ाव है।
रिव्यू में कहा गया है, "हालांकि भारत के अपेक्षाकृत मजबूत मैक्रो इकोनॉमिक फंडामेंटल्स और लगातार किए जा रहे नीतिगत प्रयास मजबूती प्रदान करते हैं, लेकिन बदलती स्थिति के लिए गहन निगरानी और संतुलित नीतिगत प्रतिक्रियाओं की जरूरत है।"
लगातार निगरानी और सतर्कता जरूरी
रिपोर्ट के अनुसार, एनर्जी डायवर्सिफिकेशन, कृषि क्षेत्र में तैयारी, महंगाई की स्थिति, बाहरी क्षेत्र की मजबूती और नीतिगत उपायों के जरिए सरकार के हस्तक्षेप आर्थिक प्रणाली की क्षमता को मजबूत करते हैं, ताकि वैश्विक घटनाओं से पैदा होने वाले निकट भविष्य के व्यवधानों को सहन किया जा सके। इसके साथ ही, बदलती परिस्थितियों को देखते हुए लगातार निगरानी और संतुलित प्रतिक्रिया बरकरार रखना भी महत्वपूर्ण है। आगे कहा गया कि इन उपायों और मौजूदा आर्थिक सुरक्षा पहलों के साथ कुछ सहारा मिलने के बावजूद, जोखिमों का संतुलन नकारात्मक दिशा में बना हुआ है। ऐसे हालात में, लगातार सतर्क रहना और सक्रिय नीतिगत कदम उठाना जरूरी होगा ताकि बदलती वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रभाव को कम किया जा सके।
हाल में तेल की कीमतों में उछाल मध्यम अवधि में महंगाई के लिए जोखिम पैदा करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऊंची ऊर्जा लागत, विशेष रूप से ईंधन की ज्यादा जरूरत वाले क्षेत्रों में धीरे-धीरे घरेलू कीमतों में तेजी में बदलती है। रिपोर्ट में कहा गया कि अगर तेल और गैस की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो इससे विभिन्न क्षेत्रों में लागत और बढ़ सकती है। इसके बावजूद, सरकार सतर्क है और घरेलू ऊर्जा की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने, और महंगाई के संभावित दबाव को कम करने के लिए उपाय कर रही है।
महंगा कच्चा तेल, व्यापार में संतुलन के लिए भी जोखिम
रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सामान के व्यापार में संतुलन के लिए भी जोखिम पैदा करती हैं। बाहर से भेजे जाने वाले पैसे (रेमिटेंस) को लेकर आउटलुक भी संवेदनशील बना हुआ है। खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council) की अर्थव्यवस्थाओं का वित्त वर्ष 2023-24 में भारत के कुल रेमिटेंस में लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा था। तेजी से अनिश्चित होते वैश्विक माहौल में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती ठोस घरेलू बुनियाद पर निर्भर करेगी।
रिपोर्ट में कहा गया कि आर्थिक वृद्धि को मजबूत बनाए रखने के लिए लगातार संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान देना जरूरी होगा, ताकि प्रतिस्पर्धा बढ़े, कार्यकुशलता बढ़े और निवेश को बढ़ावा मिले। साथ ही, बदलती वैश्विक परिस्थितियों से निपटने और विकास को बरकरार रखने के लिए तैयारी, नीतियों में तालमेल और घरेलू क्षमता बढ़ाने पर जोर देना भी महत्वपूर्ण है।