West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर 70 साल के यासीन पठान चर्चा में हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर घोषणा की है कि वे शायद बंगाल चुनाव का बहिष्कार करेंगे, क्योंकि उनके बेटे और दो बेटियों के नाम अभी भी जांच के दायरे में है। उनके तीन बच्चों तस्बीर पठान बादशाह, तानिया परवीन और तमन्ना परवीन के नाम 28 फरवरी को जारी फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने पर जांच के लिए भेजे गए हैं। 'टेंपल मैन' के नाम से मशहूर पठान को 1994 में भारत के राष्ट्रपति से प्राचीन हिंदू मंदिरों को बचाने और सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए 'कबीर पुरस्कार' मिला था।
अपने सोशल मीडिया हैंडल पर उन्होंने लिखा, "शरारती चुनाव आयोग ने मेरे बच्चों के नाम वोटर लिस्ट में 'पेंडिंग' (लंबित) रखे हैं। मैं वोट नहीं डालूंगा। मैं चुनाव (पश्चिम बंगाल) का बहिष्कार कर रहा हूं।" अपना गुस्सा जाहिर करते हुए यासीन ने सवाल उठाया कि जब उनके और उनकी पत्नी के नाम लिस्ट में हैं। तो उनके बच्चों के नाम अभी भी पेंडिंग क्यों हैं?
टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) से बात करते हुए उन्होंने कहा, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सभी दस्तावेज जमा करने के बाद भी उनके नाम शामिल नहीं किए गए। मेरा बेटा DM ऑफिस में कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाला कर्मचारी है। अगर उनके नाम सप्लीमेंट्री लिस्ट में शामिल नहीं किए जाते हैं, तो हमारा पूरा परिवार (मेरी पत्नी, दामाद और मैं) वोट का बहिष्कार करेंगे।"
पठान ने बताया कि उनके बच्चों के नाम वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट में थे। वे सुनवाई के लिए भी पेश हुए थे। इस दौरान उन्होंने अपने जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल प्रमाण पत्र और 2002 की SIR रोल पेश की थी। इन सभी में उनके माता-पिता के नाम दर्ज थे। हालांकि, इन सभी प्रयासों के बावजूद उन्हें फाइनल वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया।
यासीन पठान ने अपने पूरे जीवन में अपने गांव पाथरा मौजा (Pathra Mouja) और उसके आसपास के 42 प्राचीन हिंदू मंदिरों को बचाने, उनका जीर्णोद्धार करने और उन्हें फिर से संवारने के लिए अथक प्रयास किए। उन्हें अपने ही समुदाय से भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन किसी भी चीज ने उन्हें उनके मिशन से डिगा नहीं पाया।
साल 1994 में यासीन पठान के काम को नई पहचान मिली थी। उन्हें सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की तरफ से 'कबीर अवॉर्ड' दिया गया। यह पुरस्कार उन्हें पूर्वी मिदनापुर जिले में कभी ढहने की कगार पर खड़े 42 हिंदू मंदिरों को फिर से बनाने के लिए उनके जीवन भर के समर्पण के सम्मान में दिया गया था।
पाथरा मौजा पश्चिमी मिदनापुर कस्बे के पास है। यह पाथरा, बिंदापाथरा, रामतोता, उपरडंगा, कंचकला और हाटगेरा गांवों में फैला हुआ है। इस गांव में 18वीं शताब्दी के दर्जनों हिंदू मंदिर मौजूद हैं। पिता की मदद के लिए पठान ने एक मजदूर का काम भी किया। बाद में उन्हें अपने इलाके के एक स्कूल में चपरासी की नौकरी मिल गई। फिर 1971 में उन्होंने मंदिरों के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। शुरुआत में यासीन को अंदाजा नहीं था कि अगर एक मुस्लिम मंदिरों की देखभाल करेगा तो हिंदू समुदाय की क्या प्रतिक्रिया होगी।
एक मुस्लिम परिवार में जन्मे यासीन पठान ने भारत की समृद्ध विरासत को बचाने में अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनका यह काम धार्मिक सीमाओं से कहीं ऊपर था। बचपन से ही उन्होंने पूर्वी मिदनापुर जिले में प्राचीन हिंदू मंदिरों को फिर से बनाने में अपना जीवन लगा दिया। यह एक ऐसा अनोखा काम था जिसकी वजह से उन्हें हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के कट्टरपंथियों की आलोचना झेलनी पड़ी। लेकिन वे कभी अपने रास्ते से नहीं भटके।
स्कूल से रिटायर होने के बाद यासीन पठान ने 1970 के दशक में 'मंदिर बचाओ' (Save the Temples) मुहिम शुरू की थी। इसका मकसद पश्चिम बंगाल के पाथरा गांव में 18वीं सदी के शिव और विष्णु मंदिरों को बचाना था। पठान अब खराब सेहत की वजह से ज्यादातर अपने घर में ही रहते हैं। उन्होंने कहा, "ये मंदिर हमारी विरासत का हिस्सा हैं। मैं अगली पीढ़ी के लिए इन्हें बचाने में बस अपना छोटा सा योगदान दे रहा हूं।" बताया जा रहा है कि पाथरा गांव में कुल 34 मंदिर हैं। पठान की मुहिम की वजह से इनमें से 18 मंदिरों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने फिर से ठीक करवाया है।