Hilsa politics: दिल्ली में 1500 रुपये किलो तक बिकने वाली मछली बंगाल में हराने और जिताने जा रही चुनाव?
Bengal Chunav 2026: बंगाली लोग महंगाई, टूटी सड़कें, लेट होती ट्रेनें, इंडस्ट्री का पलायन, राजनीतिक यू-टर्न- यहां तक कि बेंगलुरु से लौटे रिश्तेदारों की नई-नई खाने की आदतें भी सहन कर सकते हैं। लेकिन अगर मछली और मांस की उपलब्धता पर सवाल उठने लगे, तो हालात बदल सकते हैं। तब बंगाल यह दिखाने में देर नहीं लगाएगा कि सहनशीलता की भी एक सीमा होती है
Hilsa politics: दिल्ली में 1500 रुपये किलो तक बिकने वाली मछली बंगाल में हराने और जिताने जा रही चुनाव?
चुनाव का मौसम है और बंगाल के वोटरों के सामने कई तरह के मुद्दे सामने हैं- कुछ स्थानीय, कुछ राष्ट्रीय और कुछ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर के भी। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग नजर आ रहा है। ऐसा लग रहा है कि राजनीति अब आम जनता के बुनियादी मुद्दों से कहीं और ही भटक गई है। अब वोटरों से यह सोचने को कहा जा रहा है कि अगर राज्य में सत्ता बदल गई, तो उनकी थाली में मिलने वाली मछली और मटन का क्या होगा? यानी असली मुद्दों से हटकर, अब लोगों के खाने-पीने तक को चुनावी बहस का हिस्सा बनाया जा रहा है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में है- हिलसा मछली, जो देश की राजधानी में 1500 रुपये किलो तक बिकती है और अब उसकी कीमत उस स्तर तक पहुंच गई है कि वो राज्य में चुनाव हराने और जिताने का दम रखती है।
पश्चिम बंगाल और हिलसा मछली का संबंध
पश्चिम बंगाल और हिलसा (Ilish) का रिश्ता केवल स्वाद का नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक पहचान, अर्थव्यवस्था और कूटनीति का है। बंगाली समाज में इसे 'मछलियों की रानी' कहा जाता है। बंगाल में हिलसा को शुभ माना जाता है और यह कई रीति-रिवाजों का हिस्सा है।
जमाई षष्ठी: दामाद के स्वागत के लिए बनने वाले विशेष भोजन में हिलसा अनिवार्य मानी जाती है।
सरस्वती पूजा और बिजया दशमी: कई परिवारों में जोड़ा हिलसा (दो मछलियां) खरीदना और उसे भोग लगाना समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
पहचान का प्रतीक: पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से आए 'घोटी' और पश्चिम बंगाल के मूल निवासी 'बांगाल' के बीच फुटबॉल के बाद अगर किसी चीज पर बहस होती है, तो वह हिलसा की गुणवत्ता है।
पश्चिम बंगाल में हिलसा का प्रोडक्शन पिछले एक दशक में काफी गिरा है। 2020-21 के आंकड़ों के अनुसार, गंगा में इसकी आवक में 15-20% की गिरावट देखी गई है। डिमांड और सप्लाई में भारी अंतर के कारण, बंगाल के बाजारों में अच्छी हिलसा ₹1,200 से ₹3,000 प्रति किलो तक बिकती है।
वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में हर साल करीब 8.36 लाख टन मछली की खपत होती है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है।
बंगाल चुनाव में कैसे हुई हिलसा की एंट्री?
मछली भात और हिलसा के मुद्दे को सबसे ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने ही चुनावी रैली में उठाया था। एक चुनावी रैली में ममता ने दावा किया कि अगर भारतीय जनता पार्टी (BJP) बंगाल में सत्ता में आती है, तो लोगों को मछली, मांस और अंडा खाने में दिक्कत हो सकती है या वे इन्हें नहीं खा पाएंगे।
उन्होंने कहा, “वे (भाजपा) आपको मछली नहीं खाने देंगे। आप मीट नहीं खा सकते, अंडा नहीं खा सकते, बांग्ला में बात नहीं कर सकते। अगर करेंगे, तो आपको बांग्लादेशी कहा जाएगा।”
ऐसा माना जा रहा है कि BJP की घुसपैठियों वाली रणनीति की काट के लिए TMC ने मछली और मीट का मुद्दा उठाया और इसे बंगाल की अस्मिता और पहचान से जोड़ने की कोशिश की।
खाने की पसंद अब पहचान और संस्कृति की लड़ाई में बदल गई है, जहां यह तय करने की होड़ मची है कि ‘असल बंगाली’ का प्रतिनिधित्व आखिर कौन करता है।
तृणमूल ने इस भावना को सियासी धार देने की कोशिश करते हुए तर्क दिया है कि BJP हिंदी भाषी व उत्तर भारत की शाकाहार-समर्थक राजनीति से जुड़ी है और पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के साथ उसका कोई मेल नहीं।
TMC की ये रणनीति काफी हद तक जमीनी चुनाव प्रचार में भी दिख रही है। क्योंकि चुनावी रैलियों में अब सिर्फ झंडे नहीं, बल्कि हवा में लहराती विशाल 'कतला' से लेकर मंचों पर सजी 'हिलसा' मछली, 'पाबदा' और 'चिंगड़ी' भी दिख रही है। इतना ही नहीं ‘माछ-भात बंगाली’ इस चुनाव में लगभग सभी दलों का अनौपचारिक नारा बनकर उभरा है।
BJP को करना पड़ रहा डैमेज कंट्रोल!
TMC की इस रणनीति का दबाव बीजेपी पर भी काफी हद तक साफ दिख रहा है। भगवा पार्टी का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस जानबूझकर डर का माहौल बना रही है।
पार्टी के नेताओं का तर्क है कि पश्चिम बंगाल में मछली या मांस पर किसी तरह के प्रतिबंध का कोई प्रस्ताव नहीं है और सत्तारूढ़ दल चुनाव को ‘मेन्यू कार्ड’ तक सीमित कर तुच्छ बना रहा है। मजेदार बात यह है कि अब BJP को खुले तौर पर यह साबित करना पड़ रहा है कि वह ‘मछली-विरोधी’ नहीं है।
PM मोदी ने भी अपनी रैली में उठाया मुद्दा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी हाल की रैली में बंगाल में मिछली प्रोडक्शन का मुद्दा उठाया। मोदी ने पूर्व मेदिनीपुर के हल्दिया में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल अभी मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है, जबकि बिहार और असम जैसे राज्यों में इस क्षेत्र में काफी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा कि देश के कई राज्यों में मछली उत्पादन में काफी बढ़ोतरी हुई है।
इसी तरह हल्दिया में, जहां बड़ी संख्या में मछुआरा समुदाय रहता है, मोदी ने कहा, “बिहार में भी मछली उत्पादन दोगुना हो गया है और अब वह दूसरे राज्यों पर निर्भर नहीं है। असम ने भी प्रधानमंत्री की मछुआरा योजना के तहत इस क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है।”
उनका कहना था कि जहां दूसरे राज्य आगे बढ़ रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल को भी मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में और काम करने की जरूरत है।
ममता बनर्जी का पलटवार
वहीं ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के इन दावों का खंडन करते हुए राज्य में हिलसा मछली की उपलब्धता और एक नए रिसर्च सेंटर पर प्रकाश डाला।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को कहा कि अब पूरे पश्चिम बंगाल में हिल्सा मछली आसानी से उपलब्ध है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी सरकार ने डायमंड हार्बर में हिल्सा मछली के लिए एक रिसर्च सेंटर बनाया गया है, ताकि इसके उत्पादन और संरक्षण को और बेहतर किया जा सके।
कई चुनावी रैलियों में ममता ने लोगों से BJP को वोट न देने की अपील की। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी सत्ता में आई, तो मछली और मांस खाने पर रोक लग सकती है।
ममता बनर्जी ने कहा, “अब पश्चिम बंगाल में हिल्सा मछली आसानी से मिल रही है। हमने डायमंड हार्बर में हिल्सा के उत्पादन के लिए एक रिसर्च सेंटर बनाया है। मछुआरा समुदाय को मदद देने के लिए मत्स्य पालन पर खास ध्यान दिया गया है। हमने मछुआरों की पहचान और सहायता के लिए ‘मत्स्यजीवी कार्ड’ भी जारी किया है।”
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि BJP बंगाल पर जबरन कब्जा करना चाहती है।
उन्होंने कहा, “बीजेपी शासित राज्यों में आप खुलकर मछली, मांस या अंडा नहीं खा सकते। अगर आप अपनी पसंद का खाना, कपड़े और अपनी भाषा की आजादी चाहते हैं, तो आपको तृणमूल को वोट देना होगा।”
उत्तर 24 परगना जिले के मिनाखां में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने सवाल उठाया, “अगर बीजेपी सत्ता में आई, तो मछुआरा समुदाय का क्या होगा?”
बंगाली सब कुछ सहन कर सकते हैं, नॉन-वेज से छेड़छाड़ नहीं!
फिलहाल यह समझना मुश्किल है कि ममता बनर्जी की ये चेतावनी विधानसभा चुनाव में कितनी असरदार साबित होगी।
क्योंकि बंगाली लोग महंगाई, टूटी सड़कें, लेट होती ट्रेनें, इंडस्ट्री का पलायन, राजनीतिक यू-टर्न- यहां तक कि बेंगलुरु से लौटे रिश्तेदारों की नई-नई खाने की आदतें भी सहन कर सकते हैं। लेकिन अगर मछली और मांस की उपलब्धता पर सवाल उठने लगे, तो हालात बदल सकते हैं। तब बंगाल यह दिखाने में देर नहीं लगाएगा कि सहनशीलता की भी एक सीमा होती है।
कम से कम TMC को तो यही उम्मीद है कि यह मुद्दा वोटरों पर असर डालेगा।