पश्चिम बंगाल में मतदान से ठीक एक हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है, जिसका बंगाल के चुनावी भविष्य पर बड़ा असर पड़ने वाला है। कोर्ट ने कहा कि जो लोग अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपनी अपील जीत जाते हैं, वे आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट डाल सकेंगे। यह फैसला SIR मामले की सुनवाई के कुछ दिन बाद आया है।
सुनवाई के तीन दिन बाद अपलोड किए गए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि योग्य मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
कोर्ट का फैसला साफ है- जिन लोगों की अपील ट्रिब्यूनल में स्वीकार हो जाती है, उन्हें विधानसभा चुनाव में वोट डालने का अधिकार होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल की ओरसे दिए गए अंतिम फैसले (चाहे नाम शामिल करने का हो या हटाने का) को राज्य में मतदान शुरू होने से पहले लागू करना जरूरी है।
बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे- 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को। 4 मई को वोटों की गिनती के साथ नतीजे आएंगे।
इससे पहले इस हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों को वोट डालने की अनुमति देने में अनिच्छा जताई थी, जिनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं और जिनकी अपील अभी ट्रिब्यूनल में लंबित है।
पिछले हफ्ते भी कोर्ट ने यही रुख अपनाया था। हालांकि, कोर्ट ने संकेत दिया था कि वह सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट जारी करने के अनुरोध पर विचार कर सकता है।
चुनाव आयोग ने पहले ही बंगाल की वोटर लिस्ट को फ्रीज कर दिया है। चुनाव से पहले कोई नया नाम इसमें नहीं जोड़ा जा सकता, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट इस पर स्पष्ट निर्देश न दे। आज कोर्ट ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया।
बांग्लादेश से लगे राज्य में 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जो 27 लाख मामलों का फैसला करेंगे। ये सभी मामले न्यायिक प्रक्रिया में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने से संबंधित हैं।