उत्तरी बंगाल में एक बार फिर “चाय की राजनीति” तेज होती दिख रही है। इस इलाके की 54 विधानसभा सीटें राज्य में अगली सरकार बनाने में बहुत अहम मानी जा रही हैं। जैसे यहां की मशहूर चाय का स्वाद सही समय और हालात पर निर्भर करता है, वैसे ही यहां का चुनावी माहौल भी खास तौर पर “स्विंग वोटर” यानी निर्णायक मतदाताओं पर टिका होता है। पश्चिम बंगाल में कुल 294 सीटों के लिए 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा। इसके बाद 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। चाय बागानों, डुआर्स और पहाड़ी इलाकों से घिरा उत्तरी बंगाल लंबे समय से राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है।
यह इलाका पहले वामपंथी दलों का गढ़ माना जाता था, लेकिन 2011 में यहां बड़ा बदलाव देखने को मिला। उस समय ममता बनर्जी की TMC ने “मां, माटी, मानुष” के नारे के साथ चुनाव लड़ा और 54 में से 28 सीटें जीतकर अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इस बीच TMC यानी तृणमूल कांग्रेस ने इस क्षेत्र पर अपना फोकस और बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अलीपुरद्वार और आसपास के तराई इलाकों से अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत की है। इससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी यहाँ अपने खोए हुए जनाधार को दोबारा मजबूत करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है।
उत्तरी बंगाल को अक्सर “स्विंग जोन” यानी ऐसा इलाका कहा जाता है, जहां चुनावी रुझान जल्दी बदल जाते हैं। इसकी वजह भी साफ है—यहां के मतदाता हर कुछ चुनावों के बाद अपना समर्थन बदल देते हैं। जलपाईगुड़ी जैसे जिले इसका अच्छा उदाहरण हैं। यहां शहर के लोग, गांव की आबादी और चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर—तीनों का मिला-जुला असर चुनावी माहौल को बहुत अनिश्चित बना देता है। इसलिए यहां वोट किस तरफ जाएगा, यह पहले से तय करना मुश्किल होता है। रोजगार, मजदूरी और सड़क-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं जैसे स्थानीय मुद्दे अक्सर बड़े राजनीतिक मुद्दों से ज्यादा असर डालते हैं।इसके अलावा राजबंशी और कामतापुरी समुदाय भी यहां अहम भूमिका निभाते हैं। इनका असर करीब 12 से 15 विधानसभा सीटों पर माना जाता है। अपनी पहचान, विकास और अलग राज्य की मांग जैसे मुद्दे लंबे समय से उठते रहे हैं, जो यहां के वोटरों के फैसले को लगातार प्रभावित करते हैं।
कभी “गोरखालैंड आंदोलन” के असर से निकलने के बाद दार्जिलिंग के पहाड़ी इलाकों में अब राजनीतिक एकता पहले जैसी नहीं रही। यहां की राजनीति अब अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई नजर आती है। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी—दोनों ही पार्टियां वोट पाने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन पर ज्यादा निर्भर हो गई हैं। तृणमूल कांग्रेस ने “भारतीय जनमुक्ति मोर्चा” के साथ हाथ मिलाया है। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पुरानी रणनीति को जारी रखते हुए पहाड़ी इलाकों के स्थानीय संगठनों के साथ साझेदारी बनाए रखी है। इसी रणनीति की वजह से भाजपा कई सालों से दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रही है।
दार्जिलिंग की पहाड़ियां और बदलती राजनीति
दार्जिलिंग की पहाड़ियों में कभी एकजुट रहा “गोरखालैंड आंदोलन” अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। अब यहां की राजनीतिक ताकतें कई हिस्सों में बंट गई हैं, जिससे वोट देने का तरीका भी बदल गया है। तृणमूल कांग्रेस ने यहां गठबंधन की रणनीति अपनाई है। पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारने के बजाय अनिल थापा के नेतृत्व वाली “भारतीय जनमुक्ति मोर्चा” को तीन सीटें दी हैं, ताकि मिलकर बेहतर प्रदर्शन किया जा सके।
वहीं भारतीय जनता पार्टी भी पहाड़ी इलाकों में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन पर भरोसा कर रही है। यह वही रणनीति है, जिसकी मदद से पार्टी जसवंत सिंह के समय से ही दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर अपनी पकड़ बनाए हुए है। इसके अलावा, कड़े मुकाबले वाले चुनाव क्षेत्र भी बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। पिछले करीब 15 सालों में उत्तरी बंगाल की कई सीटों पर जीत और हार का अंतर बहुत कम रहा है। ऐसे में वोटिंग पैटर्न में थोड़ा सा बदलाव भी नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है।
चुनाव से पहले बदले समीकरण
राजनीति में लगातार बदलती वफादारियों ने इस चुनाव को और भी दिलचस्प बना दिया है। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राज्यसभा सांसद अनंत महाराज अब तृणमूल कांग्रेस के करीब आ गए हैं। वहीं तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक अर्घ रॉय बर्मन और राजघराने से जुड़े नेता बंसी बदन बर्मन भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। इन दलबदल का असर मतदाताओं के मूड और वोटिंग पर साफ दिखाई दे सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तृणमूल कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल कर पाएगी, या फिर भारतीय जनता पार्टी उत्तरी बंगाल में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखेगी—इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा। उत्तरी बंगाल की मशहूर “फर्स्ट फ्लश” चाय की तरह ही, यहाँ के चुनावी नतीजे पूरे राज्य का माहौल तय करने वाले हैं। 54 अहम सीटें और ऐसे मतदाता, जिनका रुख कभी भी बदल सकता है—इन सबके बीच यह इलाका एक बार फिर तय कर सकता है कि कोलकाता की सत्ता का “सबसे मीठा कप” आखिर किसके हाथ लगेगा।