आयुर्वेद में नाभि को पूरे शरीर का केंद्र माना है, जो पूरे शरीर के इलाज में अहम रोल निभाता है। सर्दियों का मौसम शरीर में रूखापन बढ़ाता है, क्योंकि इस मौसम में शरीर में वात दोष बढ़ता है। वहीं, सरसों का तेल एंटी बैक्टीरियल होने के साथ ही शरीर को अंदर से डीटॉक्स करने का भी काम करता है। भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में नाभि पर तेल लगाने को एक सरल लेकिन खुद की देखभाल का कारगर तरीका माना गया है। माना जाता है कि नाभि में नियमित रूप से तेल लगाने से पाचन में सुधार होता है, रक्त संचार बढ़ता है, तनाव कम होता है और वात, पित्त और कफ में सामंजस्य बनता है।
तीनों दोषों को संतुलित करता है सरसों का तेल
सरसों के तेल को आयुर्वेद में कई गुणों से भरपूर बताया गया है। ये एंटीबैक्टीरियन होने के साथ ही विषहरण करने वाला यानी टॉक्सिनंस को बाहर करने वाला तेल माना जाता है। आयुर्वेद का कहना है कि सर्दी का मौसम शरीर में वात दोष बढ़ाता है। इसके कारण बॉडी में रूखापन, अकड़न और एनर्जी की कमी महसूस होती है। सरसों का तेल प्राकृतिक रूप से गर्म होता है और नाभि पर इसे लगाने से शरीर को अंदर से गर्मी मिलती है। नाभि पर सरसों के गुनगुने तेल की कुछ बूंदों से मालिश करने से जोड़ों की अकड़न, पेट में तकलीफ और सूजन से राहत मिल सकती है। रात में सोने से पहले इस तेल से मालिश करके छोड़ दें।
नाभि में तेल लगाने का महत्व
कैलिफोर्निया आयुर्वेद कॉलेज के अनुसार, नाभि में तेल लगाना बरसों से चली आ रही खुद की देखभाल करने की आयुर्वेदिक परंपरा है। आयुर्वेद कहता है कि नाभि की देखभाल के जरिए आप शरीर के मूल भाग को पोषण दे सकते हैं, पाचन को मजबूत कर सकते हैं, रक्त संचार में सुधार कर सकते हैं, दर्द से राहत पा सकते हैं।
त्वचा का नमी और पोषण : नाभि के आसपास नारियल, तिल या बादाम जैसे तेल लगाने से ये त्वचा में गहराई तक प्रवेश होता है। यह रूखी या परतदार त्वचा को नमी देता है और लचीलापन बढ़ाने में भी मदद करता है।
डाइजेशन को मजबूत करना : अदरक या सरसों वाला गुनगुना तेल पाचन तंत्र को उत्तेजित करता है। नाभि की मालिश करने से पेट फूलना कम होता है और खाने को अच्छी तरह पचाने में मदद मिलती है। नियमित अभ्यास से कब्ज और अपच जैसी समस्याओं से भी राहत मिल सकती है।
हार्मोनल और मेंस्ट्रुअल हेल्थ बेहतर होती है : अरंडी या नीम के तेल से नाभि पर तेल लगाने से हार्मोनल उतार-चढ़ाव नियंत्रित होता है। महिलाओं को मासिक धर्म की परेशानी, मूड स्विंग और पीएमएस के लक्षणों में कमी हो सकता है।
डिटॉक्स और बेहतर रक्त संचार : सरसों और नीम जैसे तेलों में टॉक्सिंस को शरीर से बाहर निकालने के प्राकृतिक गुण होते हैं। नाभि पर लगाने पर, ये अशुद्धियों को बाहर निकालने और रक्त प्रवाह को उत्तेजित करने में मदद कर सकते हैं।
दर्द से राहत और वात संतुलन : नाभि पर गर्म अरंडी के तेल की मालिश करने से बढ़े हुए वात दोष को संतुलित करके पेट में ऐंठन, जोड़ों की अकड़न और पीरियड्स के दर्द से राहत मिल सकती है। इस तेल का सूजन-रोधी गुण मांसपेशियों को आराम देने, तनाव कम करने में मदद करते हैं।
आंखों और होंठों के लिए भी अच्छा : आयुर्वेद में, नाभि को पोषण देने को आंखों और होठों की सेहत से जोड़ा गया है। शुद्ध घी या सरसों का तेल लगाने से आंखों की कोशिकाएं मजबूत हो सकती हैं और शरीर के मुख्य एनर्जी प्वाइंट को जरूरी पोषण देने से फटे होंठों को रोका जा सकता है।
प्रजनन क्षमता को भी करता है प्रभावित : नाभि पर घी या नारियल के तेल की मालिश करने से प्रजनन सेल्स को पोषण मिलता है। नियमित अभ्यास से प्रजनन क्षमता में सुधार हो सकता है।
नाभि में लगाने के लिए ये तेल हैं सबसे अच्छे
इस तरह लगाएं नाभि में तेल