New IT Rules: 3 घंटे के नए कंटेंट 'टेकडाउन' नियम से इन्फ्लुएंसर्स और क्रिएटर्स की बढ़ी टेंशन, क्या खतरे में है कमाई?

Content Takedown Rules: इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने आईटी नियमों (2021) में संशोधन करते हुए आपत्तिजनक कंटेंट को हटाने की समय सीमा 36 घंटे से घटाकर मात्र 3 घंटे कर दी है। सरकार का मकसद डीपफेक और गलत जानकारी को तेजी से फैलने से रोकना है

अपडेटेड Feb 16, 2026 पर 8:41 AM
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नए नियमों से क्रिएटर्स को डर है कि इतने कम समय में गलतियां होने की गुंजाइश बढ़ जाएगी और उनकी मेहनत पर पानी फिर सकता है

New Takedown Rules: भारत सरकार ने सोशल मीडिया कंटेंट को लेकर नियमों में बड़ा बदलाव किया है, जिससे देश की क्रिएटर इकोनॉमी में संकट के बदल मंडराने लगे है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने आईटी नियमों (2021) में संशोधन करते हुए आपत्तिजनक कंटेंट को हटाने की समय सीमा 36 घंटे से घटाकर मात्र 3 घंटे कर दी है। सरकार का मकसद डीपफेक और गलत जानकारी को तेजी से फैलने से रोकना है, लेकिन क्रिएटर्स को डर है कि इतने कम समय में गलतियां होने की गुंजाइश बढ़ जाएगी और उनकी मेहनत पर पानी फिर सकता है। आइए आपको बताते हैं क्या है 3 घंटे का नया नियम।

क्या है 3 घंटे का 'टेकडाउन' नियम?

नए नियमों के मुताबिक, अगर किसी कंटेंट को लेकर शिकायत मिलती है या वह नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उसे 3 घंटे के भीतर हटाना होगा। यह नियम खास तौर पर AI द्वारा बनाए गए डीपफेक, अश्लील सामग्री और समाज के लिए खतरनाक कंटेंट पर लगाम लगाने के लिए लाया गया है।


क्रिएटर्स की क्या है चिंता?

क्रिएटर एकता मखीजानी और आकांक्षा कोमिरेली जैसे प्रोफेशनल्स का मानना है कि यह समय सीमा बहुत कम है। उनके अनुसार, कई बार ऑटोमेटेड सिस्टम सही कंटेंट को भी गलत समझ लेते हैं। जैसे- पेरेंटिंग वीडियो या ब्रेस्टफीडिंग एजुकेशन को सिस्टम अक्सर ब्लॉक कर देता है। यानी इसमें गलत रिपोर्टिंग का डर रहता है।

अगर रात के 2 बजे कोई नोटिस आता है, तो एक छोटा क्रिएटर 3 घंटे में उसका जवाब कैसे देगा? बड़े ब्रांड्स के पास तो कानूनी टीमें होती हैं, लेकिन छोटे क्रिएटर्स अकेले ही सब संभालते हैं। इसके साथ ही अगर किसी ब्रांड कैंपेन के दौरान वीडियो गलती से हट जाता है, तो क्रिएटर को भारी आर्थिक नुकसान और कानूनी विवादों का सामना करना पड़ सकता है।

भाषा और व्यंग्य पर संकट

भारत एक विविध देश है जहां दर्जनों भाषाएं बोली जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई सिस्टम अक्सर क्षेत्रीय भाषाओं, व्यंग्य या पैरोडी को नहीं समझ पाते। Kofluence के सह-संस्थापक रितेश उज्जवल के मुताबिक, किसी तमिल या मराठी व्यंग्य वाले वीडियो को सिस्टम गलत मानकर हटा सकता है। जब तक उस पर दोबारा विचार होगा, तब तक उस वीडियो का महत्व खत्म हो चुका होगा।

एआई लेबलिंग की नई चुनौती

नियमों में अब एआई के इस्तेमाल वाले कंटेंट पर 'AI Label' लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। फैशन और लाइफस्टाइल क्रिएटर्स को डर है कि इससे उनके वीडियो की खूबसूरती खराब होगी। साथ ही, अगर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इन लेबल्स वाले वीडियो की 'रीच' कम कर देते हैं, तो क्रिएटर्स के लिए अपनी बात लोगों तक पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा।

एजेंसियां आईं बचाव में

बदलते नियमों को देखते हुए 'Kofluence' और 'Chtrbox' जैसी एजेंसियां अब क्रिएटर्स की मदद के लिए आगे आई हैं। वे ऐसे सिस्टम बना रही हैं जिससे:

  • वीडियो अपलोड करने से पहले ही उसकी कानूनी जांच हो सके।
  • क्रिएटर्स को नए नियमों के प्रति जागरूक किया जा सके।
  • कैंपेन में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए इंश्योरेंस जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सके।

कुल मिलाकर, नए नियमों से कंटेंट की दुनिया में अब 'पहले हटाओ, फिर पूछो' का दौर शुरू हो सकता है, जो सुरक्षा के लिहाज से तो ठीक है, लेकिन क्रिएटिविटी की आजादी और क्रिएटर इकोनॉमी के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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