AAP के दो तिहाई यानी 10 में से 7 सांसद राघव संग गए BJP के पास, अब केजरीवाल के पास बस ये रास्ता

AAP Crisis: राघव चड्ढा ने यह भी दावा किया कि स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी भी आप छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं। इन सब के जाने के बाद राज्यसभा में AAP के केवल तीन सांसद बचे, जिसमें संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल शामिल हैं

अपडेटेड Apr 24, 2026 पर 4:25 PM
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AAP के दो तिहाई यानी 10 में से 7 सांसद राघव संग गए BJP के पास, अब केजरीवाल के पास बस ये रास्ता

पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी को बहुत बड़ा झटका लगा है। उसके दो तिहाई राज्यसभा सांसद ने पार्टी छोड़ कर बीजेपी का दामन थाम लिया है। राघव चड्ढा, संदीप पाठक और आशोक मित्तल ने शुक्रवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर AAP छोड़ने और BJP में विलय करने का ऐलान किया। संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राघव चड्ढा ने कहा, "हमने यह फैसला किया है कि हम, राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई सदस्य, भारत के संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए खुद को BJP में मिला लेंगे।"

राघव चड्ढा ने यह भी दावा किया कि स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी भी आप छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं। इन सब के जाने के बाद राज्यसभा में AAP के केवल तीन सांसद बचे, जिसमें संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल शामिल हैं।

चड्ढा ने कहा कि AAP के ऊपरी सदन (राज्यसभा) के लगभग दो-तिहाई सांसद BJP में शामिल हो जाएंगे। उन्होंने उस पार्टी पर आरोप लगाया, जो कभी दिल्ली में भ्रष्टाचार से लड़ने के वादों के दम पर सत्ता में आई थी, कि अब वह ईमानदार राजनीति से दूर होती जा रही है।


अब केजरीवाल के पास क्या रास्ता?

आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर चल रही इस उठापटक और संभावित टूट को लेकर कानूनी स्थिति काफी पेचीदा है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कोई गुट पार्टी से अलग होता है, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का खतरा तब तक बना रहेगा जब तक चुनाव आयोग (EC) उन्हें "असली पार्टी" के रूप में मान्यता नहीं दे देता।

वर्तमान कानून के अनुसार, पार्टी के भीतर 'विभाजन' को अब मान्यता नहीं मिलती। अयोग्यता से बचने का एकमात्र तरीका किसी दूसरी पार्टी में विलय करना है, जिसके लिए गुट के पास कम से कम दो-तिहाई (2/3) विधायकों/सांसदों का समर्थन होना अनिवार्य है।

तो क्या चुनाव आयोग जाएगा मामला?

अगर कोई अलग गुट खुद को "असली AAP" बताता है, तो यह मामला चुनाव आयोग जाएगा। जब तक चुनाव आयोग इस पर अंतिम मुहर नहीं लगाता, तब तक सदन में वे उसी मूल पार्टी के सदस्य माने जाएंगे और पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने पर उनकी सदस्यता जा सकती है।

अलग होने वाले गुट को यह साबित करना होगा कि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा यानी कैडर- राष्ट्रीय परिषद और पदाधिकारी भी उनके साथ हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, चुनाव आयोग पार्टी के संविधान और पदाधिकारियों के समर्थन वाले हलफनामों की जांच करेगा। केवल संख्या बल के आधार पर 'असली पार्टी' का दावा अब पर्याप्त नहीं है।

मौजूदा स्थिति में AAP के पास लोकसभा में 3 सांसद हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ये तीन सांसद इस पूरे विवाद में 'किंगमेकर' की भूमिका निभा सकते हैं। यदि इन 3 में से 2 सांसद (2/3 बहुमत) अलग गुट के साथ चले जाते हैं, तो उन्हें संसद में अयोग्यता से राहत मिल सकती है।

क्योंकि AAP एक राष्ट्रीय पार्टी है, इसलिए केवल विधानसभा ही नहीं बल्कि संसद में मौजूद उसके प्रतिनिधियों का रुख भी चुनाव आयोग के फैसले को प्रभावित करेगा। 3 सांसदों में से अगर बहुमत (कम से कम 2) टूटता है, तो यह कानूनी रूप से 'विभाजन' के बजाय 'असली हकदारी' के दावे को मजबूत करेगा।"

AAP से दूर जा रहा हूं जनता के पास आ रहा हूं- राघव

AAP नेता राघव चड्ढा ने कहा, "जिस AAP को मैंने 15 सालों तक अपने खून से सींचा वो अपने मार्ग से हट गई है। अब यह देशहित के लिए नहीं बल्कि अपने निजी फायदों के लिए काम कर रही है। मैं AAP से दूर जा रहा हूं और जनता के पास आ रहा हूं। हम सभी ने मिलकर इस पार्टी को दिल्ली, पंजाब और देश के अन्य राज्यों तक पहुंचाने का प्रयास किया था।"

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