West Bengal Election Results: जैसे जैसे 4 मई का दिन ढल रहा है, पश्चिम बंगाल के आकाश पर भगवा रंग और भी गाढ़े तरीके से छाता नजर आ रहा है. शाम 5 बजे के करीब जब यह रिपोर्ट तैयार की जा रही है उस वक्त पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव काउंटिंग में बीजेपी 198 सीटों पर आगे चल रही है। टीएमसी 89 सीटों पर आगे है और कांग्रेस के पास दो सीटें जाती नजर आ रही हैं। अब यह तय है कि पश्चिम बंगाल में अगला मुख्यमंत्री बीजेपी का होगा और ममता बनर्जी को विपक्ष में बैठना होगा।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज जो परिवर्तन नजर आ रहा है, वह महज एक इत्तेफाक नहीं है। यह परिणाम है गृह मंत्री अमित शाह के उस रणनीतिक 'चक्रव्यूह' का, जिसने ममता बनर्जी के अभेद्य माने जाने वाले किलों को न सिर्फ चुनौती दी, बल्कि उन्हें भीतर से ढहा दिया। जहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने पारंपरिक जनाधार और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के भरोसे बैठी रही, वहीं भाजपा ने डेटा और जमीनी हकीकत के मेल से खेल ही बदल दिया
ममता बनर्जी कल तक अपने जमीनी जुझारूपन और 'दीदी' की छवि के भरोसे चौथी बार सत्ता की दहलीज चूमने का ख्वाब देख रही थीं, उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक चुकी है। भाजपा की इस ब्लॉकबस्टर जीत के पीछे केवल रैलियां नहीं, बल्कि एक बेहद वैज्ञानिक और रणनीतिक तैयारी थी, जिसने टीएमसी की चुनावी मशीनरी को पंगु बना दिया।
1. महिला वोट बैंक में बड़ी दरार और 'अन्नपूर्णा' का दांव
ममता बनर्जी का सबसे बड़ा कवच महिला मतदाता मानी जाती थीं, लेकिन इस बार आरजी कर (RG Kar) और संदेशखली (Sandeshkhali) जैसी घटनाओं ने उस भरोसे को झकझोर दिया। अभी उन 39 सीटों में से 35 पर भाजपा आगे है जहां महिला वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। टीएमसी की 'लक्ष्मी भंडार' के जवाब में भाजपा ने 'अन्नपूर्णा भंडार' का वादा किया, जिसमें 3000 रुपये प्रति माह देने का प्रस्ताव था। इस सीधे आर्थिक मुकाबले ने टीएमसी के सबसे बड़े लाभ को बेअसर कर दिया।
2- SIR' एक्सरसाइज: मतदाता सूची का शुद्धिकरण
भाजपा ने इस बार 'बाहरी' मतदाताओं और फर्जी नामों के नैरेटिव को एक ठोस रणनीति में बदल दिया। चुनाव आयोग ने 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) कराया। इसके बाद करीब 27 लाख संदिग्ध नामों को मतदाता सूची से बाहर किया गया। जिन 54 सीटों पर 5% से अधिक मतदाता हटाए गए, वहां भाजपा ने अपनी सीटों की संख्या 18 से बढ़ाकर 36 कर ली, जबकि टीएमसी अपनी आधी सीटें यहां गंवा बैठी।
3. डेटा के महारथी मैदान में उतारे
इस पूरे चुनाव के साइलेंट आर्किटेक्ट' रहे आईआईटी (IIT) और एनएलयू (NLU) जैसे संस्थानों से आए युवा जिन्होंने एक एजेंसी के साथ मिलकर अपने डेटा एनालिटिक्स के जरिए बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति को समझा और ममता की काट ढूंढी। इन्होंने हर जिले के लिए अलग फ्रेमवर्क तैयार किया। एक साल से इन्होंने बेरोजगारी और औद्योगिक गिरावट (जैसे 6,800 कंपनियों का बाहर जाना) जैसे मुद्दों पर डेटा-आधारित नैरेटिव तैयार किया, जिसने आम जनता के बीच गहरी पैठ बनाई।
4. जंगलमहल और छोटे समुदायों का ध्रुवीकरण
भाजपा ने केवल बड़े मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि माइक्रो लेवल पर समुदायों को साधा। जंगलमहल के जिलों (बांकुरा, झाड़ग्राम, पुरुलिया) में कुर्मी समुदाय को साधने के लिए उनकी भाषा 'कुर्माली' को संवैधानिक मान्यता देने का वादा किया गया। बड़े चेहरों के साथ-साथ भाजपा ने आदिवासी, गोरखा, नेपाली और मतुआ समुदायों के 'माइक्रो-इन्फ्लुएंसर्स' का सहारा लिया, जिससे संदेश स्थानीय स्तर पर अधिक विश्वसनीय लगा।
5. सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी और 'परिवर्तन' की लहर
भाजपा ने पश्चिम बंगाल के करीब 20 से 50 लाख सरकारी कर्मचारियों और रोजगार की तलाश में भटक रहे युवाओं की दुखती रग पर हाथ रखा। अमित शाह ने वादा किया कि सत्ता में आने के 45 दिनों के भीतर सातवां वेतन आयोग लागू किया जाएगा। इस एक वादे ने राज्य के शिक्षित मध्यम वर्ग और युवाओं को भाजपा की ओर मोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई।