कूड़े के पहाड़ में फंसी जिंदगियां...गाजीपुर लैंडफिल के पास इस हाल में रह रहे हैं लोग, देखें ग्राउंड रिपोर्ट
Delhi Ghazipur Landfill : आए दिन कूड़े के ढेर में आग लग जाती है। इससे उठने वाला धुआं कई किलोमीटर तक आवासीय एरिया में जाता है। इससे लोगों को सांस लेने में परेशानी होती है, साथ ही प्रदूषण भी होता है। साल का हर मौसम यहां रहने वाले लोगों के लिए अलग परेशानियां लेकर आता है। बारिश होने पर कूड़ा सड़ने लगता है तो गर्मी में आग लग जाने से कूड़े का धुंआ चारों ओर फैलता है
दिल्ली के गाजीपुर कूड़े के पहाड़ के पांच किमी. के दायरे में लाखों लोग रहते हैं।
Ghazipur Landfill : "यहां हर मौसम में अलग-अलग तरह की परेशानी होती है, अभी आपने देखा न कितना धुंआ आ रहा है। इस धुएं की वजह से हम गर्मी के इस मौसम में भी कूलर तक नहीं चला पा रहे। गर्मी, धुंआ और बदबू...यहां रहना मुश्किल है। पर अपना घर छोड़कर जाएं तो जाएं कहां" - इतना कहते ही गाजीपुर लैंडफिल के पास बनी कालोनी में रहने वाली 55 वर्षीय गिरजा देवी चुप हो जाती हैं। उनके मुंह से शब्द तो नहीं निकल रहे थे पर आंखों में बेबसी और गुस्सा साफ नजर आ रहा था।
दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल कॉरिडोर से आगे बढ़ेंगे तो आपको राजधानी के वर्तमान का भी एक चेहरा दिखेगा। आसमान में उड़ते चील-कौवे, हवा में तेज दुर्गंध, दूर से दिखता कुड़े का पहाड़ और उसमे से निकलता धुंए के बादल...ये सारी चीजें आपको याद दिला देंगी कि आप राजधानी दिल्ली के गाजीपुर लैंडफिल के पास पहुंच गए हैं।
दिल्ली में हैं तीन लैंडफिल
लैंडफिल उस एरिया को कहते हैं, जहां शहर भर का कुड़ा कचरा डाला जाता है। राजधानी दिल्ली में तीन लैंडफिल एरिया है, गाजीपुर, भलस्वा और ओखला। वैसे तो गाजीपुर के कुड़े का पहाड़ देश में ही नहीं दुनिया भर की मीडिया में चर्चा में रहता है। लेकिन उनलोगों की चर्चा काफी कम ही होती है जो इस कुड़े के पहाड़ के पास रहते हैं। गाजीपुर लैंडफिल के पांचकिलोमीटर के एरिया में लाखों लोग रहते हैं। इन लोगों की सुबह और शाम कुड़े के पहाड़ को देख कर ही होती है। जब इनसे पूछो की आप यहां क्यों रहते हो तो ये जवाब मिलता है।
हर मौसम में अलग परेशानियां
आए दिन कूड़े के ढेर में आग लग जाती है। इससे उठने वाला धुआं कई किलोमीटर तक आवासीय एरिया में जाता है। इससे लोगों को सांस लेने में परेशानी होती है, साथ ही प्रदूषण भी होता है। कूड़े के पहाड़ से हमेशा बदबू आते रहती है। इससे कई किलोमीटर तक के आवासीय एरिया के लोग परेशान रहते हैं। जिस तरफ हवा जाती है। दुर्गंध से उधर के लोग परेशान हो जाते हैं। साल का हर मौसम यहां रहने वाले लोगों के लिए अलग परेशानियां लेकर आता है। बारिश होने पर कूड़ा सड़ने लगता है तो गर्मी में आग लग जाने से कूड़े का धुंआ चारों ओर फैलता है।
दिल्ली में हर दिन निकलता है इतना कचरा
द हिन्दू की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में हर दिन करीब 11,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है। इसमें से पूर्वी दिल्ली के इलाकों में रोज़ाना करीब 2,600 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। इसमें से लगभग 700 मीट्रिक टन कचरा गाजीपुर लैंडफिल में डाला जाता है। एक तरफ पुराने, जमा हुए कचरे को खोदकर हटाने की कोशिश होती है तो दूसरी तरफ नए कचरे से भरे ट्रक रोज़ इन्हीं जगहों पर पहुंचते रहते हैं। नगर निगम (एमसीडी) के पास तुगलकाबाद, ग़ाज़ीपुर, ओखला और भलस्वा में चार वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट हैं। लेकिन ये प्लांट मिलकर भी हर दिन सिर्फ 8,500 मीट्रिक टन कचरे का ही ट्रीटमेंट कर पाते हैं। जबकि दिल्ली में रोज करीब 11,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है।
यमुना को भी नुकसान
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT)की हालिया रिपोर्ट ने गाजीपुर में फैली गंभीर समस्याओं को उजागर किया है। रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली नगर निगम (MCD) के तमाम दावों के बावजूद गाजीपुर का कूड़े का पहाड़ पहले से कहीं ज्यादा ऊंचा और खतरनाक हो गया है। लैंडफिल साइट की ऊंचाई 40 मीटर की तय सीमा को पार कर 60 मीटर तक पहुंच चुकी है। रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता इस बात पर जताई गई है कि लैंडफिल साइट से निकलने वाली गंदगी सीधे यमुना नदी में पहुंच रही है। जब बारिश का पानी इस कूड़े से होकर गुजरता है, तो वह गाद बनकर नालों के जरिए यमुना में मिल जाता है, जिससे पानी जहरीला हो जाता है। यह स्थिति पर्यावरण के साथ-साथ दिल्लीवासियों के स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बन गई है।
गाजीपुर लैंडफिल को आसपास की हर इमारत से देखा जा सकता है। यह जगह 70 एकड़ से ज्यादा में फैली है और इसके चारों ओर डेयरी फार्म, पोल्ट्री फार्म, बूचड़खाने और रिहायशी कॉलोनियां हैं। पिछले साल गाजीपुर लैंडफिल साइट में चार बार आग लगने की घटना सामने आई थी। इससे पहले 2017 में इसका कुछ हिस्सा सड़क पर गिर गया था, जिससे दो लोगों की मौत हो गई थी।
देश के लिए कूड़ा बनती जा रही है बड़ा समस्या
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 2019-20 में 1.50 लाख टन कचरा हर दिन पैदा हुआ था. जबकि 2020-21 में ये कूड़ा बढ़कर 1.60 लाख टन से ज्यादा हो गया. चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा देश है, जहां हर साल सबसे ज्यादा कचरा पैदा होता है। 2020 में आई सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायर्मेंट की रिपोर्ट बताती है कि भारत की तीन हजार लैंडफिल साइट में 80 करोड़ टन कचरा जमा है। भारत के लिए कूड़े की समस्या इसलिए भी बढ़ती जा रही है, क्योंकि किसी भी शहर में कूड़े को लैंडफिल साइट में डम्प करने के बजाय कोई दूसरा सॉलिड सिस्टम नहीं है।
गाजीपुर लैंडफिल में कचरा डालने की शुरुआत 1984 में हुई थी। जब इसकी ऊंचाई बहुत ज़्यादा बढ़ने लगी, तो 2002 में इसे बंद करने का फैसला किया गया। लेकिन शहर में किसी और लैंडफिल की सुविधा नहीं होने के कारण यहां कचरा डालना जारी रहा। अब तक कई बार अलग-अलग पार्टियों ने इस कचरे के पहाड़ को हटाने का वादा किया है, लेकिन आज भी यह वैसा ही खड़ा है। फिलहाल इस कूड़ें के पहाड़ को हटाने के डेडलाइन 2026 है।