दिवाली के तुरंत बाद दिल्ली-एनसीआर की हवा फिर से जहरीली हो गई है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, नोएडा और ग्रेटर नोएडा भी प्रदूषण की रेस में बराबरी कर रहे हैं। हरे-भरे और खुली सड़कों वाला ग्रेटर नोएडा भी इस प्रदूषण की मार से नहीं बच पाया। यहां AQI 400 के पार पहुंच चुका है, जिससे लोगों को सांस लेने में मुश्किल, आंखों में जलन और लगातार खांसी जैसी समस्याएं होने लगी हैं। ग्रेडेड रैपिड एक्शन प्लान की तीसरी स्टेज लागू होने के बाद भी हवा का हाल बेहाल है। इसके पीछे पटाखों का धुआं, पराली जलाना, तेज़ी से बढ़ता ट्रैफिक और लगातार चल रही निर्माण गतिविधियां बड़े कारण माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण को कम करने के लिए न केवल सरकारी कदम जरूरी हैं, बल्कि आम नागरिकों को भी जिम्मेदारी दिखानी होगी। ट्रैफिक, निर्माण गतिविधियां और पराली जलाना दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण का मुख्य कारण हैं।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का हाल
पिछले हफ्ते दिल्ली-एनसीआर का AQI इतनी ज्यादा बढ़ गई कि एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन (CAQM) ने कई नियंत्रण उपाय लागू किए। इसमें निर्माण कार्यों पर रोक, सड़कों पर ट्रैफिक नियंत्रण और स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं को हाइब्रिड मोड में चलाना शामिल था। ये कदम बच्चों और नागरिकों की सुरक्षा के लिए उठाया गया।
सबसे प्रदूषित शहरों की सूची
18 नवंबर को भारत के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर और उनका AQI:
AQI 400 से ऊपर वाले शहरों को ‘सीवियर’ श्रेणी में रखा गया है। दिल्ली का AQI 350 ‘बहुत खराब’ श्रेणी में दर्ज हुआ।
ग्रेटर नोएडा और दिल्ली में सबसे खराब एरिया
ग्रेटर नोएडा में नॉलेज पार्क5 का AQI 457 रहा। दिल्ली के 39 मॉनिटरिंग स्टेशन में बवाना सबसे ज्यादा प्रदूषित रहा (431), इसके बाद जहांगीरपुरी (422), वजीरपुर (417) और विवेक विहार (406) हैं।
बच्चों पर प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर
Policybazaar की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। सभी प्रदूषण-संबंधी हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम्स में से 43% 0-10 साल के बच्चों के लिए थे। इसका मतलब है कि बच्चे अन्य उम्र समूहों की तुलना में पांच गुना ज्यादा प्रभावित हैं।
31-40 साल के वयस्कों के क्लेम्स 14% हैं। वहीं 60 साल से ऊपर उम्र के लोगों का सिर्फ 7% है। इसका मतलब है कि युवा और बाहर ज्यादा रहने वाले लोग सबसे ज्यादा खतरे में हैं।
प्रदूषण से बढ़ रहे स्वास्थ्य के मामले
प्रदूषण के कारण दिल और फेफड़े की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। अब ये बीमारियां अस्पताल में भर्ती होने वाले मामलों का 8% हिस्सा बन चुकी हैं।