'मेरा भाई तो अब तक लापता है, शायद उसकी लाश भी इसी मलबे के नीचे कहीं दबी हो। शुरुआत में काफी खोजने की कोशिश की पर अब सारी उम्मीद खो चुका हूं।'...'अब रात में जब भी बारिश होती है तो मुझे नींद ही नहीं आती, एक डर सा लगा रहता है'
'मेरा भाई तो अब तक लापता है, शायद उसकी लाश भी इसी मलबे के नीचे कहीं दबी हो। शुरुआत में काफी खोजने की कोशिश की पर अब सारी उम्मीद खो चुका हूं।'...'अब रात में जब भी बारिश होती है तो मुझे नींद ही नहीं आती, एक डर सा लगा रहता है'
ये सारी बातें कहते हुए धराली के शैलेंद्र पवार की आंखों में भाई को खोने का दर्द था तो महेश सिंह पवार की आंखों में उस आपदा का खौफ अभी भी बरकरार था। धराली में आए आपदा को 10 महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है पर वहां के लोगों की जिंदगी उस हादसे के ही इर्द गिर्द घूम रही है। जहां कभी सेब के बगीचों में जीवन की मिठास घुली रहती थी, अब यहां की पहचान ये आपदा बन गई है। लोगों ने इस आपदा में अपने परिवार, घर और जानवर... सबकुछ को मलबे में तब्दील होते देखा। कभी गुलजार रहने वाला धराली का बाजार अब मलबे का ढेर है। कहीं ढही हुई दीवारों के बीच कपड़े और जूते बिखरे हैं, तो कहीं पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों के बीच घरों के बर्तन दबे हुए दिख जाते हैं। इन नजारों को देखकर ऐसा लगता है मानो ये सब अब भी उस खौफनाक मंजर की गवाही दे रहे हों।

हिमालय की ऊंची चोटियों में उतरकर धराली में आती खीर गंगा...यूं तो शांत और धीमे प्रवाह में बहती है, लेकिन 5 अगस्त 2025 को इसने अपना ऐसा रूप दिखाया, जिससे इस इलाके का पूरा नक्शा ही बदल गया। धराली में बीते पांच अगस्त को खीरगंगा से आई बाढ़ ने मिनटों में बाजार, होटल और घर बहा दिए। तबाही के साथ पीछे रह गए सिर्फ़ मलबे के ढेर, अपनों की तलाश में सदमे में डूबे वे लोग और कई सवाल?
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले का धराली गांव, पहले गंगोत्री यात्रा करने वाले लोगों को लिए एक अहम पड़ाव था। यहां यात्रियों के वजह से काफी चहल पहल भी रहती थी। पर बीते साल आई आपदा ने सबकुछ बदल दिया। धराली गांव आज सन्नाटे और बर्बादी में कहीं खोया हुआ नजर आता है। यात्री इस मार्ग से अभी भी जाते हैं पर अब वो यहां नहीं रूकते। यात्री आते हैं मलबों की तस्वीरें खींचते हैं और चले जाते हैं। इस आपदा के करीब 10 महीने बाद मैं धराली पहुंचा। जहां मैंने धराली में धंसे मकानों और मलबे के बीच से गुजरते हुए उन परिवारों से बात की, जिन्होंने चंद मिनटों में ही अपना सबकुछ खो दिया।

धराली पहुंचने के बाद मैं सबसे पहले मिला यहीं के रहने वाले शैलेंद्र पवार से। इस आपदा में उन्होंने अपना होटल खोया और उनका भाई अभी तक लापता है। शैलेंद्र बताते हैं कि, 'जब दोपहर में ये आपदा आई तो मैं पहाड़ी पर बने अपने पुश्तैनी घर में खाना खाने गया था और इसी वजह से मैं बच गया। इस आपदा में मेरा सारा काम चला गया और मेरा भाई अभी भी लापता है। शायद उसकी लाश इसी मलबे में कहीं दबी हो। अब तो हम सारी उम्मीद ही छोड़ चुके हैं। मेरा होटल भी अब मलबे में बदल गया है।'
शैलेंद्र के मुताबिक, पांच अगस्त की दोपहर खीरगंगा से आई बाढ़ ने पलक झपकते ही पूरे गांव को निगल लिया। दर्जनों घर, होटल और सेब के बगीचे बह गए। हादसे के 10 महीने बीतने के बाद भी अब भी जेसीबी मशीन टूटे घरों और होटलों से मलबे हटाने का काम कर रही है।
धराली निवासी शैलेंद्र पवार
जिस दिन आपदा आई, उस सुबह धराली में मौजूद सोमेश्वर देवता के मंदिर में मेला था। गांव के लोग तैयारियों में व्यस्त थे और आसपास के इलाकों से भीड़ जुटने वाली थी। दोपहर तक मंदिर के प्रांगण में करीब 50 से 60 लोग मौजूद थे। लेकिन लगभग डेढ़ बजे, खीरगंगा से बाढ़ का सैलाब सीधी रेखा में आया और उसके सामने जो भी घर, दुकान या होटल था, वह बह गया। मंदिर का भी एक हिस्सा टूट गया पर प्रांगण में मौजूद लोगों की जान बच गई और वो पहाड़ी की ओर भागे। मंदिर के पुजारी महेश सिंह पवार बताते हैं कि, 'आपदा के कुछ ही देर पहले मंदिर में गांव के 50 से 60 लोग मौजूद थे और पूजा कर रहे थे। अगर पूजा 10 मिनट पहले समाप्त हो जाती तो सारे लोग गांव में चले जाते और फिर ये हादसा और भी बड़ा होता।' उन्होंने आगे बताया कि, अब जब भी रात में बारिश होती है तो नींद ही नहीं आती है एक डर सा लगा रहता है।
सोमेश्वर देवता के मंदिर के पुजारी महेश सिंह पवार
सोमेश्वर देवता के मंदिर से आगे बढ़ा तो वहां मौजूद एक युवक ने मुझसे सवाल किया कि क्या आप किसी NGO से आए हैं? अपना परिचय बताने के बाद युवक ने उस हादसे का आंखों देखा हाल काफी संजीदगी से बताई। युवक ने सबसे पहले सोमेश्वर देवता के मंदिर का नाम लिया और कहा इनकी वजह से ही हम सब आज जिंदा हैं। इस गांव के नौ लोगों की मौत इस आपदा में हुई। बिहार और कई जगहों से कई मजदूर आए थे जो अब भी लापता हैं। इस आपदा में मैंने अपने कई दोस्तों को भी खोया है, भले ही वो मेरे से कम उम्र के थे पर हम सब साथ थे। क्या ये गांव फिर से बस पाएगा? इस सवाल पर युवक ने थोड़ी देर के लिए चुप्पी साध ली और फिर सरकार का नाम लेकर आगे बढ़ गए। जाते हुए युवक ने अपना नाम विनोद बताया।
धराली निवासी विनोद पवार
गंगोत्री यात्रा मार्ग पर, गंगोत्री से लगभग 22 किलोमीटर पहले बसा धराली इस मार्ग एक ऐसा पड़ाव था, जहां तीर्थयात्री और पर्यटक रुकते और बाजार में चहल-पहल होती थी। लेकिन 5 अगस्त की दोपहर में सब बदल गया। ये आपदा आई कैसे और क्या इससे बचा जा सकता था? फिलहाल इन सवालों का जवाब ठीक तरीके से नहीं मिल पाया है। हादसे के बाद इस घटना की सबसे बड़ी वजह बादल का फटना माना जा रहा था पर कुछ समय बीत जाने के बाद इसे भी विशेषज्ञों द्वारा खरिज कर दिया गया। पहले लोग सोच रहे थे कि धराली आपदा बादल फटने (क्लाउडबर्स्ट) या ग्लेशियर झील फटने (GLOF) से हुई होगी। लेकिन इंटरनेशनल जर्नल ‘नेचुरल हेजर्ड्स’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस हादसे की असली वजह श्रीकांता ग्लेशियर पर एक बड़े बर्फ के टुकड़े का अचानक गिरना था। श्रीकांता ग्लेशियर की ऊपरी ढलान पर करीब 5,200 मीटर ऊंचाई पर एक बड़ा बर्फ का पैच था। इतना भारी बर्फ का टुकड़ा अचानक ढह गया और तेजी से नीचे की ओर सरकने लगा। बर्फ का यह बड़ा टुकड़ा खीरगंगा की तरफ लगभग 1700 मीटर नीचे गिरा।रास्ते में चट्टानों से टकराने से बहुत घर्षण हुआ। बर्फ तेजी से पिघलने लगी।इससे अचानक बहुत सारा पानी निकला। साथ ही यह बर्फ ढीली मिट्टी, चट्टान के टुकड़ों और गाद को भी अपने साथ बहाकर ले गई।

वहीं धराली के वापस आते वक्त मेरी मुलाकात गांव से सबसे आखिरी छोर बने एक छोटी दुकान को चलाने वाले प्रथम सिंह से हुई। प्रथम भी इस आपदा के पीड़ितों में से एक हैं। पिछले साल तक वो एक होटल के मालिक थे, जो अब मलबे के नीचे दबी हुई है। प्रथम ने बताया कि, मेरी उम्र करीब पचास साल है और अब तक मैंने कई तूफान, बाढ़ और कई प्राकृतिक आपदाओं को देखा है पर बीते साल जो आपदा आई थी... ऐसा पहले कभी कुछ भी नहीं देखा था। एक पल में सबकुछ तबाही आई और किसी को बचने का भी मौका नहीं मिला। होटल के बदले सरकार से मुझे 8 लाख रूपए का मुआवजा जरूर मिला है पर इतने पैसों में वो सबकुछ वापस नहीं पा सकता जो पहले मेरे पास था। अब ये छोटी सी दुकान चलाता हूं क्योंकि मेरे बच्चे उत्तरकाशी के स्कूल में पढ़ते हैं। उन्हें इस जगह से फिलहाल दूर रखा है। इस हादसे में हमारे प्राचीन कल्पकेदार का मंदिर भी टूट गया है। इतनी बात कहने के बाद वो वापस अपने काम में लग जाते हैं क्योंकि दुकान के पास ही कुछ यात्री चाय का इंतजार कर रहे थे।
धराली के लोगों के आंखों में उस हादसे का खौफ अभी भी साफ-साफ दिखता है। धराली अब सिर्फ़ एक गांव ही नहीं बल्कि दर्जनों कहानियों का मलबा है, जिनमें जिंदगी और उम्मीद दबी हुई है।
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